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Monday, September 5, 2016

अस्ताचलगामी सूर्य


देख ले अपना अंत 
ह्रासोन्मुख सूर्य 
जिन नर्म नाज़ुक झाड़ियों को 
सारे दिन तू जलाता रहा 
झुलसाता रहा 
अभी उनका कद तुझसे भी 
ऊँचा हो गया है !   
दिन भर तेरी तीव्र तपिश को सह कर 
ये निरीह सी नर्म नाज़ुक 
झाड़ियाँ भी अब विद्रोही हो चुकी हैं !
ऐ अस्ताचलगामी सूर्य 
देख इन नन्हे-नन्हे पौधों को,
इनके तेवर को और 
इनके अनोखे बाँकपन को !
तेरी आँखों में आँखें डाल
ये तुझसे तेरे ज़ुल्म का 
हिसाब माँग रहे हैं !
तेरी आँखों में इनके 
कटीले नुकीले पत्ते 
काँटों की तरह 
चुभ रहे हैं या नहीं ? 
एक दुर्दांत आतंकी को 
इससे बड़ा दण्ड
और क्या मिल सकता है 
कि वह प्रकृति की 
सबसे कोमल कृति का 
ताब भी सह न पाए और 
अपने सारे हथियार डाल
धरा की गोद में 
समाहित हो जाने के लिए 
विवश हो जाए !
                



साधना वैद