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Thursday, September 22, 2016

सरिता हूँ मैं



१
जीवन मेरा
समर्पित सिंधु को
सरिता हूँ मैं

२
पिघली बर्फ
पर्वत से उतरी
प्रवाहमयी

३
उथली धारा
कल-कल बहती
नीचे पहुँची

४
चंचल धारा
झर-झर गिरती
झरना बनी

५
बन गयी मैं
मिल सखियों संग
गहरी नदी

६
बहती चली
जंगल मैदानों में
बंधन मुक्त

७
बहती रही
अथक अहर्निश
युगों युगों से

८
एक ही साध
तदाकार हो जाऊँ
पिय अंग मैं

९
मीठा या खारा
सागर का जल ही
मेरा अभीष्ट

१०
पर्याय हम
सिंधु और सरिता
नि:स्वार्थ प्रेम 

११
मिसाल बनूँ
समर्पण के हित
याद की जाऊँ



साधना वैद

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