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Thursday, July 11, 2019

सावनी ताँँका



बरस गयी
सावन की फुहार
अलस्सुबह,
भिगो गयी बदन
   सुलगा गयी मन ! 




झाँक रहा है
बादल की ओट से
नन्हा सूरज,
कैसे बाहर आऊँ 
कहीं भीग न जाऊँ !



भाग रहे थे
श्वेत श्याम बादल
पकड़ने को
धरा माँ का आँचल
   ना मिला तो रो पड़े ! 



सुहावनी है
सावन की बयार
साथ लाती है
मधुरिम पलों की
स्मृतियाँ बारम्बार !




याद आता है
बारिश में भीगना
चलते जाना
नर्म गीली दूब पे
पाँव थकने तक !


साधना वैद 

4 comments :

  1. बहुत सुन्दर

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  2. हार्दिक धन्यवाद केडिया जी !

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना सोमवारीय विशेषांक १५ जुलाई २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  4. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी ! सप्रेम वन्दे !

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