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Monday, September 30, 2019

पुष्पगुच्छ रजनीगन्धा का



हसरत ही रही
मैं पुष्पगुच्छ बन रजनीगन्धा का
तुम्हें भेंट किया जाता !
तुम अतुलनीय प्यार से
मुझे अपने हाथों में थाम
माथे से लगातीं
सराहना भरी दृष्टि से
निर्निमेष मुझे देर तक निहारतीं
फिर नयन मूँद
चाँदनी से शुभ्र श्वेत मेरे
कोमल पुष्पों को
अपने मृदुल स्पर्श से
हौले हौले सहलातीं !
धीमे से उन्हें ऊपर उठा
गहरी साँस ले उनकी सारी
भीनी भीनी सुगंध को
बड़ी तृप्ति के साथ
आत्मसात करतीं  !
अपने कोमल कपोलों से
उन्हें बड़े प्यार से छुलातीं
और अगाध प्यार से
अपने हृदय से लगा कर
कमरे की खुली खिड़की के पास
जाकर मेरी यादों में खो जातीं !
तुम्हारे नैनों की आर्द्रता
मेरे जीवन की सबसे
अनमोल धरोहर होती !
और उस नमी के सहारे ही
मैं खिला रहता
अनंत काल तक
तुम्हारे सुबहो शाम
तुम्हारे दिन रात
महकाने के लिये
तुम्हारे तृषित अधरों पर
एक मीठी सी मुस्कान
लाने के लिये !
जो होता मैं एक पुष्पगुच्छ
रजनीगन्धा का !

साधना वैद



12 comments :

  1. बेहद खूबसूरत रचना

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    1. हार्दिक धन्यवाद अनुराधा जी ! आभार आपका !

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  2. Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद अनीता जी ! आभार आपका !

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  3. कल्पना बहुत सुन्दर है |

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (02-10-2019) को    "बापू जी का जन्मदिन"    (चर्चा अंक- 3476)     पर भी होगी। 
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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    1. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वंदे !

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  5. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना 2 अक्टूबर 2019 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आपका पम्मी जी ! सप्रेम वंदे !

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  6. बहुत सुंदर रचना

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    1. हार्दिक धन्यवाद ज्योति खरे जी ! आभार आपका !

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