
फागुन का मास तो
हर बरस आता है ,
लाल, पीले,
हरे, नीले
रंगों से सराबोर
ना जाने कितने कपड़े
हर साल बाँटती हूँ
फिर भी
नहीं जानती
मेरे मन की
दुग्ध धवल श्वेत चूनर
अभी तक
कोरी की कोरी
ही कैसे रह गयी !
कितना विचित्र
अनुभव है कि
एक प्राणवान शरीर
रंगों से खेल रहा होता है
और एक निष्प्राण आत्मा
नितांत पृथक और
निर्वैयक्तिक हो
असम्पृक्त भाव से
बहुत दूर से
इस फाग को अपने
निस्तेज नेत्रों से
अपलक निहारती
रहती है और
कामना करती है
कभी तो उसके श्याम
उसके आँगन में आयेंगे
और उसके मन की
चूनर पर रंग भरी
अपनी पिचकारी से
सतरंगी फूल बिखेरेंगे !
साधना वैद