Followers

Sunday, September 19, 2010

* परिणति *

भावों की भेल,
आँखों का खेल,
शब्दों का मेल,
प्यार की निशानी है !

होंठों पे गीत,
नैनों में मीत,
पाती में प्रीत,
जोश में जवानी है !

आँचल की छाँव,
सपनों का गाँव,
कविता की नाव,
प्यार की रवानी है !

उल्फत का मोल,
लोगों के बोल,
तल्खी का घोल,
रीत ये पुरानी है !

सूली पर प्यार,
रिश्तों की मार,
अपनों से हार,
दुःख भरी कहानी है !

साधना वैद

Saturday, September 18, 2010

* कस्तूरी-मृग * अंतिम भाग 4

अब तक आपने पढ़ा ----
शिखा बाज़ार से लौटती है तो खाने के लिए माँ को इन्कार कर सीधी ऊपर चली जाती है ! माँ चिंतित हो बहू रचना को उसका हालचाल लेने के लिए भेजती हैं ! शिखा रचना को काम समाप्त कर उसके पास आने के लिए कहती है ! बाज़ार में रेडीमेड कपड़ों की दूकान पर उसकी पुरानी सहेली सरोज मिल जाती है जो इन दिनों शहर में ए डी एम के पद पर आसीन है ! शिखा उसे देख कर बहुत खुश हो जाती है ! सरोज का रुतबा और शान शौकत, उसकी सम्पन्नता और दुकानदार का सरोज के साथ खुशामदी व्यवहार शिखा को अपने बौनेपन का अहसास दिला जाते हैं और वह बहुत क्षुब्ध हो जाती है ! सरोज उसे बताती है कि उसकी सभी सहेलियाँ कुछ ना कुछ कर रही हैं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं ! सरोज की मँहगी खरीदारी के सामने शिखा का अपना थोड़े से पैसों का छोटा सा बिल उसे और शर्मिन्दा कर जाते हैं ! अपने छात्र जीवन में अत्यंत मेधावी और प्रतिभाशाली शिखा उच्च शिक्षा प्राप्त कर न्यायाधीश बनना चाहती थी ! इसीलिये उसने एम ए और एल एल बी में एक साथ दाखिला लिया था ! लेकिन अच्छा घर वर मिल जाने पर माता पिता उसका विवाह एक पारंपरिक संयुक्त परिवार में कर देते हैं ! शिखा के पति एक ज़िम्मेदार और समझदार व्यक्ति हैं ! शिखा की सास नहीं चाहतीं कि शिखा अपनी पढ़ाई आगे जारी रखे ! शिखा को मन मार कर इस फैसले को स्वीकार करना पडता है और उसकी पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है ! संयुक्त परिवार की जिम्मेदारियां उठाते-उठाते उसकी महत्वाकांक्षाएं पिछड़ जाती हैं और वह केवल एक आदर्श पत्नी, बहू, गृहणी और माँ बन कर ही रह जाती है ! सरोज से हुई मुलाक़ात उसके मन की सुप्त पीड़ा को जगा देती है ! उसे दुःख होता है कि उसकी सभी सहेलियां आत्मनिर्भर हैं और उच्च शिक्षा प्राप्त कर सबने अपना कैरियर बना लिया है बस एक वही जो सबसे अधिक मेधावी थी मात्र गृहणी बन कर रह गयी है ! वह अपनी भाभी रचना से जब अपने मन का दुःख बाँटती है तो रचना उसे समझाने का प्रयास करती है !

अब आगे ----

“ शिखा मैं तुम्हारे मन की पीड़ा बाँट तो नहीं सकती ना ही तुम्हें तुम्हारा अभीष्ट कैरियर दिलाने में सक्षम हूँ ! लेकिन एक बात तुमसे ज़रूर पूछना चाहती हूँ क्या तुम्हारे लिए मात्र धनोपार्जन में ही शिक्षा की सार्थकता है ? क्या जीवन को केवल भैतिक स्तर पर रख कर सुख-दुःख के तराजू में तोला जाना चाहिए? भावनात्मक पहलू का कोई मोल, कोई महत्त्व नहीं होता ? “
“ है क्यों नहीं भाभी ! “ शिखा ने प्रतिवाद करते हुए उत्तर दिया. “ मैं अपना कैरियर सिर्फ धन कमाने के उद्देश्य से ही नहीं बनाना चाहती थी ! मेरे लिए भावनात्मक सुख और आत्मिक संतोष भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना यथार्थ रूप में अपने कैरियर के लिए समर्पित होना ! अपनी शिक्षा, अपनी योग्यता का मैं सही अर्थों में इस्तेमाल करना चाहती थी ! अपने देश अपने समाज की सेवा करना चाहती थी ! क्या इससे आत्म संतोष नहीं मिलता ? आज जो काम मैं कर रही हूँ घर सम्हालने का वह तो हमारी दादी नानी जो बिलकुल अनपढ़ थीं वे भी भली भाँति कर लेती थीं और हमारी माँ और सास जो अपेक्षाकृत कम पढ़ी लिखी हैं वे भी बखूबी कर लेती हैं ! फिर हम लोगों की इन डिग्रियों की सार्थकता क्या हुई ? इतनी पढ़ाई की थी तो कुछ काम भी ऐसा करते कि समाज में नाम होता एक पहचान होती ! ”
“ तो शिक्षा की सार्थकता क्या नौकरी करने में ही है ? “ रचना ने पलट कर प्रश्न किया ! “ क्या शिक्षित होना तुम्हारे स्वयं के लिए सुख और संतोष का कारण नहीं है ? क्या पढ़ाई केवल दूसरों को प्रभावित करने के लिए और दूसरों का कार्य करने के लिए ही की जानी चाहिए ? इसका अर्थ तो यह हुआ कि तुम यह सोचती हो कि तुमने तो बहुत अधिक पढ़ लिया है ! इससे अधिक ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता ही नहीं क्योंकि घर गृहस्थी चलाने के लिए इससे अधिक पढ़ाई की तो आवश्यकता ही नहीं होती ! नयी जानकारी प्राप्त करना, ज्ञान बढ़ाना, प्रबुद्ध होना तो सदैव आनंद और सुख को बढ़ाता है ! ज्ञान की राह पर चलने वाला इंसान कभी कुण्ठित नहीं होता और इस राह का कहीं अंत नहीं होता ! “
रचना ने प्यार से शिखा को थपकते हुए कहा, “ रहा सवाल समाज सेवा का तो शिखा हर सिक्के के दो पहलू होते हैं ! अगर तुम्हारे दृष्टिकोण से नौकरी करके अच्छी तरह से समाज सेवा हो सकती है तो मेरे दृष्टिकोण से नौकरी ना करके उससे भी बेहतर तरीके से समाज सेवा की जा सकती है ! “
“ वो कैसे ? “ शिखा ने उत्सुकता से रचना को निहारा !
“ वो ऐसे कि जो लोग अनावश्यक रूप से केवल इसलिए नौकरी कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने बहुत पढ़ाई कर ली है और पढ़ाई खत्म करने के बाद नौकरी ही उनका लक्ष्य होता है, कहीं न कहीं उस ज़रूरत मंद का अधिकार छीन कर उसके साथ अन्याय कर रहे होते हैं जिसको इस नौकरी की उनसे कहीं अधिक ज़रूरत होती है ! समाज में कितने ही ऐसे परिवार हैं जिनके यहाँ धनाभाव के कारण दोनों वक्त समुचित भोजन की व्यवस्था कर पाना आज भी एक विकराल समस्या है ! उस वर्ग में आज भी कितने ही शिक्षित बेरोजगार युवक और युवतियां हैं जो अपनी डिग्रियाँ और प्रमाणपत्र लिए नौकरी की तलाश में न जाने कितने दफ्तरों, संस्थाओं और दुकानों के चक्कर लगा कर अपने जूते घिसते दिखाई देते हैं लेकिन सूर्यास्त के साथ-साथ उनकी उम्मीदें भी दम तोड़ देती हैं और अगला दिन फिर इसी संघर्ष और नाकामी की दास्तान दोहराने के लिए उदित होता है ! तुम्हारे स्थान पर अगर ऐसे किसी व्यक्ति को नौकरी मिल जाए तो क्या अप्रत्यक्ष रूप से तुम उसकी समस्या सुलझाने में सहायक नहीं हुईं ? क्या समाज सेवा का एक रूप यह नहीं हो सकता ? या तुम्हारा अहम तभी तुष्ट होगा जब तुम नौकरी कर कमाये हुए धन से गरीबों के लिए खाना, कपड़ा, किताबें, खिलौने इत्यादि दान में देकर उन्हें आत्म निर्भर बनाने की जगह उन्हें उनकी बेचारगी का अहसास दिला कर और अधिक हीन भावना से ग्रस्त कर दो और यह सब करके दानवीर होने के गौरव से खुद को ही महिमामंडित करती रहो ? मेरे विचार से नौकरी उसे करनी चाहिए और उसे मिलनी चाहिए जिसकी ज़रूरत बड़ी है ना कि उसे जिसकी डिग्री बड़ी है या जिसकी सिफारिश दमदार है ! “
शिखा उठ कर बैठ गयी थी ! उसकी सारी इन्द्रियाँ कानों में केंद्रित हो गयी थीं, “ इस नज़र से तो मैंने कभी सोचा ही नहीं भाभी ! लेकिन क्या महिलाओं को नौकरी करनी ही नहीं चाहिए ? क्योंकि आम तौर पर हमारे समाज में हर घर में धन कमाने का कार्य तो पुरुष ही करते हैं और यही सही समझा जाता है ? “
“ मैंने यह तो नहीं कहा कि महिलाओं को नौकरी करनी ही नहीं चाहिये ! मैं उनके सर्विस करने विरुद्ध बिलकुल भी नहीं हूँ ! मैं सिर्फ यह कहना चाहती हूँ कि केवल मनोरंजन और अहम् की तुष्टि के लिए नौकरी नहीं करनी चाहिये ! महिलाओं पर नौकरी के अलावा गृहस्थी का भी भार होता है ! नौकरी करने से घर और बच्चों की कुछ न कुछ उपेक्षा तो अवश्य ही होती है ! लेकिन अगर पारिवारिक परिस्थितियाँ सचमुच विषम हों और संकट की स्थिति हो तो नौकरी करना नितांत आवश्यक हो जाता है ! ऐसे में नौकरी ना करने का निर्णय घातक भी हो सकता है ! मेरी बात सुन रही हो ना ? “ रचना ने शिखा को दुलारते हुए कहा !
“ हाँ सुन रही हूँ भाभी आप ठीक कह रही हैं ! “ शिखा का स्वर स्थिर था !
रचना का वक्तव्य जारी था, “ शिखा मुझे याद है एक बार तुमने ही मुझे बताया था कि धीरज तुम्हें बहुत प्यार करते हैं ! वे कहते हैं ‘मैं नहीं चाहता मेरी शिखा किसीके आधीन होकर काम करे ! ऑफिस में गलतियाँ हो जाने पर किसी की झिड़कियाँ खाए, डाँट सुने ! मेरी शिखा सिर्फ मेरे लिए है !’ और इसीलिये शायद किंचित प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने तुम्हें कभी सर्विस करने की अनुमति नहीं दी ! और मुझे यह भी याद है यह अंतरंग वार्ता जब तुमने मुझे सुनाई थी तब तुम्हारी आंखों में अनुराग और प्रेम की जो ज्योति जल उठी थी वह तुम्हारे दाम्पत्य के शेष समस्त जीवन को प्रकाशित करने के लिए सक्षम थी ! क्या तुम सुख संतोष की इस दौलत की तुलना उस दौलत से कर सकती हो जो तुम्हारी सहेलियों ने नौकरी कर जुटा रखी है ! तुम्हारी दौलत अक्षुण्ण, अनमोल और चिरंतन है पगली और उनकी दौलत अस्थाई ! दूर के ढोल सुहावने लगते हैं ! कभी उनके जीवन में झाँक कर देखना ! ऐशो आराम से भरे पूरे उनके घरों में उनके अपने पारिवारिक सम्बन्ध कितने खोखले, बनावटी, तनाव भरे और बमानी से हो जाते हैं ! उनके यहाँ पति और घर के बुज़ुर्ग नौकरों के भरोसे और बच्चे आया के भरोसे रहने के लिए विवश होते हैं ! स्कूल से लौटने के बाद बच्चे या तो नौकरों के साथ उठ बैठ कर उनकी गंदी भाषा, उनकी बुरी आदतें, उनके खराब संस्कार सीखते हैं या दिन भर गली मोहल्लों में सड़कों पर नज़र आते हैं ! माँ की ममता, प्यार और अनुशासन के अभाव में वे जिद्दी, चिड़चिड़े और कुण्ठित हो जाते हैं ! ये ही बच्चे मन का आक्रोश दबाने के लिए कई बार नशीली दवाओं का सेवन करने लगते हैं या अन्य कई बुरी आदतों के शिकार हो जाते हैं ! क्या ऐसी खबरें तुमने अखबारों और पत्र पत्रिकाओं में कभी नहीं पढीं ? जितनी अच्छी तरह से तुम अपने बेटों की परवरिश कर रही हो, चरित्र निर्माण में उनकी सहायता कर रही हो, दोनों बच्चे कितने होशियार, समझदार, सुशील और संस्कारवान हैं क्या यह तुम्हारे लिए गर्व और संतोष का विषय नहीं है ? “ रचना का स्वर आवेशित हो उठा था !
“ रही बात आत्म संतोष की तो शिखा संतोष का भाव तो मनुष्य के अंदर ही होता है उसे पहचानने भर की ज़रूरत होती है ! तुम तो उस कस्तूरीमृग की तरह हो जिसकी नाभि में कस्तूरी होती है लेकिन वह अज्ञानतावश उसकी सुगंध से भ्रमित हो चारों ओर उसे ढूँढता फिरता है ! तुम सुख को अपनी खंडित महत्वाकांक्षाओं से जोड़ कर व्यर्थ ही दुखी और निराश रहती हो जबकि वास्तव में तुम सबसे भाग्यवान और सुखी हो ! देखो शिखा हर परिवार का वातावरण, परिस्थितियाँ और जीवन के प्रति दृष्टिकोण अलग-अलग होते हैं ! तुम जिस परिवार में गयी हो वहाँ सब यही पसंद करते हैं कि स्त्रियाँ घर में रह कर ही घर परिवार की देखभाल करें ! बच्चों को उचित शिक्षा और संस्कार दें ! सबको भरपूर प्यार दें और बदले में वे भी स्त्रियों को यथासंभव सुख, सम्मान और सुरक्षा देना चाहते हैं ! शायद पीढ़ियों से उनके परिवार की यही परम्परा रही होगी ! उस परम्परा का मान रखना तुम्हारा धर्म है शिखा ! फिर तुम अपने पथ से विचलित क्यों होती हो ? उनके संस्कार बहुत दृढ हैं ! उन सबसे विद्रोह करके क्या तुम यह सुख और सम्मान अर्जित कर पातीं जो आज तुमने उनकी इच्छाओं का सम्मान करके, उनकी भावनाओं का आदर करके अर्जित किया है ? मेरे ख्याल से तुम जितनी भावुक और संवेदनशील हो सबका विरोध करके, सबको असंतुष्ट करके तुम स्वयं भी सदैव दुखी और अपराध बोध से ग्रस्त रहतीं और दुःख के बीज बोकर उनके और अपने जीवन में नर्क की सृष्टि कर लेतीं ! धन तो शायद आ जाता लेकिन सुख संतोष जीवन में समाप्त हो जाता ! आज जिस प्रकार से तुमने परिवार के हर सदस्य का प्यार दुलार पाया है, तुम अपने परिवार का एक अभिन्न और अनिवार्य अंग बन गयी हो क्या यह तुम्हारे लिए हर्ष और आनंद का विषय नहीं है ? पढ़ाई का क्या है तुम जब चाहो जितना चाहो आगे पढ़ सकती हो ! अब तो पत्राचार के माध्यम से घर बैठे ही अनेकों अच्छे-अच्छे कोर्सेज़ किये जा सकते हैं ! ये तुम्हें इस लायक बना सकते हैं कि जीवन में जब भी ज़रूरत पड़े तुम नौकरी कर सको ! लेकिन अभी तुम अपनी उपलब्धियों से मुँह मत मोड़ो शिखा ! उन्हें इस तरह नकारो मत ! अपने भीतर की कस्तूरी को पहचानो और उसके सौरभ से अपने परिवार, अपने परिवेश और अपने जीवन को सुगन्धित कर दो ! अपने मन को भटकने मत दो ! “ आँसुओं के आवेग से रचना की आवाज़ लरजने लगी थी ! लेकिन शिखा का मन बिलकुल हल्का हो गया था ! उसके मनाकाश से दुःख की बदली छँट गयी थी ! निरुद्विग्न मन में रचना का एक-एक शब्द प्रकाश पुन्ज बन उसके ह्रदय का कोना-कोना आलोकित कर रहा था !

समाप्त

साधना वैद

Thursday, September 16, 2010

* कस्तूरी-मृग * - भाग ३

अब तक आपने पढ़ा -----
शिखा बाज़ार से लौटती है तो खाने के लिए माँ को इन्कार कर सीधी ऊपर चली जाती है ! माँ चिंतित हो बहू रचना को उसका हालचाल लेने के लिए भेजती हैं ! शिखा रचना को काम समाप्त कर उसके पास आने के लिए कहती है ! बाज़ार में रेडीमेड कपड़ों की दूकान पर उसकी पुरानी सहेली सरोज मिल जाती है जो इन दिनों शहर में ए डी एम के पद पर आसीन है ! शिखा उसे देख कर बहुत खुश हो जाती है ! सरोज का रुतबा और शान शौकत, उसकी सम्पन्नता और दुकानदार का सरोज के साथ खुशामदी व्यवहार शिखा को अपने बौनेपन का अहसास दिला जाते हैं और वह बहुत क्षुब्ध हो जाती है ! सरोज उसे बताती है कि उसकी सभी सहेलियाँ कुछ ना कुछ कर रही हैं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं ! सरोज की मँहगी खरीदारी के सामने शिखा का अपना थोड़े से पैसों का छोटा सा बिल उसे और शर्मिन्दा कर जाते हैं !
अब आगे -----
शिखा अपने माता पिता की सबसे लाड़ली और सबसे छोटी संतान थी ! पिता जब भी किसीसे उसका परिचय कराते गर्व से उनका मुखमण्डल दीप्त हो उठता, “ यह हमारे घर में सबसे होनहार और प्रतिभाशाली है ! पढ़ाई में ही नहीं नृत्य, संगीत, अभिनय, बैडमिंटन, कैरम सभी में चैम्पियन है ! ढेरों कप्स और सर्टीफिकेट्स जीते हैं इसने ! “ पिता के प्रशंसापूर्ण वचनों को सुन शिखा फूली न समाती ! अपने भविष्य के लिए उसने बहुत सारे सपने सँजो रखे थे ! उसके जीवन का लक्ष्य था कि वह उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद न्यायाधीश के सर्वोच्च आसान पर बैठेगी ! इसीलिये उसने ग्रेजुएशन के बाद एम ए और एल एल बी दोनों में एक साथ दाखिला लिया था ! सरोज तब उसके साथ ही लॉ कॉलेज में पढ़ती थी ! मात्र चार पाँच महीने का साथ ही तो था ! लेकिन इन चार पाँच महीनों में ही शिखा की बुद्धिमत्ता और व्यक्तित्व का सिक्का पूरे कॉलेज में जम गया था ! आज जो सरोज ए डी एम के गरिमामय पद पर आसीन है उन दिनों शिखा के आगे पीछे उसके नोट्स माँगने के लिए घूमा करती थी ! भाग्य की बात थी ! शिखा के पिता रिटायर हो चुके थे ! माँ अक्सर बीमार रहा करती थीं ! शिखा उनकी सबसे छोटी संतान थी ! वे अपने सामने ही जल्दी से जल्दी उसके दायित्व से निवृत हो जाना चाहते थे ! अच्छा घर वर मिल गया तो उन्होंने शिखा के हाथ पीले कर देना ही उचित समझा ! विवाह से पूर्व उन्होंने धीरज और उनके माता पिता से शिखा की पढ़ाई अधूरी ना रहने देने का वचन अवश्य ले लिया था ! और वचन की यह क्षीण सी डोर थाम शिखा दुल्हन बन अपनी ससुराल आ गयी ! मन में अभी भी यह विश्वास अपनी जड़ें जमाये हुए था कि वह अपनी पढ़ाई ज़रूर पूरी करेगी और एक न एक दिन अपना न्यायाधीश बनने का सपना भी ज़रूर साकार करेगी !
शादी के बाद फाइनल इम्तहान का फॉर्म भरने के लिए जैसे ही शिखा ने अपनी सास जी से अनुमति माँगी उन्होंने स्पष्ट शब्दों में इनकार कर दिया, “ स्कूल कॉलेज में तो बहुत शिक्षा ले चुकीं बहूरानी ! अब घर गृहस्थी की शिक्षा भी ले लो ! वास्तविक जीवन में यही शिक्षा काम आयेगी ! मैंने तो धीरज की शादी इसीलिये जल्दी की थी कि बहू आकर घर गृहस्थी के कामों में मेरा हाथ बँटाएगी ! तुम पढ़ने के लिए फिर से मायके चली जाओगी तो फ़ायदा क्या हुआ ! “
सास के तीखे वचन सुन कर शिखा का ह्रदय टूट गया था ! भविष्य के लिए सँजोये सारे स्वप्न चूर-चूर हो गए थे ! एक मात्र सहानुभूति और सहयोग की अपेक्षा उसे धीरज से रह गयी थी ! सो वह भी टूट गयी जब उन्होंने भी उसके आँसू पोंछते हुए यही दिलासा दिया था कि, “ इस साल माँ का मन रख लो शिखा ! वे भी बीमार रहती हैं ! इम्तहान तो तुम अगले साल भी दे सकती हो ! इस घर में तुमने अभी नया-नया प्रवेश किया है सबकी भावनाओं का ध्यान रखोगी तो तुम्हारी जड़े यहाँ मजबूत होंगी ! और अभी से अपने मन की करोगी तो उस प्यार दुलार मान सम्मान से वंचित रह जाओगी जो इस घर में तुम्हारा स्थान बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है ! तुम माँ की बात मान लोगी तो हमेशा के लिए उनके दिल में जगह बना लोगी ! और ससुराल में आते ही उनका विरोध कर उनको नाराज़ कर दोगी तो सब तुमसे विमुख हो जायेंगे और यह तुम्हारे लिए ही अहितकर होगा ! “
शिखा का ह्रदय रो पड़ा पर उसके पास समझौता करने के अलावा अन्य कोई मार्ग न था ! धीरज की बात में व्यावहारिकता थी ! और नई नवेली दुल्हन में सास और पति की बात को अमान्य कर देने का साहस न था ! परिणामस्वरूप शिखा की पढ़ाई उस साल स्थगित हो गयी और उसके जीवन में वह सुखद ‘अगला साल’ फिर कभी नहीं आया जिसमें उसकी महत्वाकांक्षाओं के बीज अंकुरित हो सकते थे ! एक मासूम ह्रदय के मासूम से चंद सपने बेमौत मर गए थे !
शिखा की ससुराल का परिवार भी औसत आमदनी वाला एक आम मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार था जहाँ कर्तव्यों और दायित्वों के निर्वाह के लिए इच्छाओं, भावनाओं और कभी-कभी अपनी ज़रूरतों का भी गला घोंटना अनिवार्य हो जाता है ! धीरज परिवार में सबसे बड़े थे ! सबका ध्यान रखना, सबकी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, और घर परिवार की सारी जिम्मेदारियों को जी जान से पूरा करना अपना धर्म समझते थे ! उनकी अर्धांगिनी होने के नाते हर कार्य में उनका सहयोग करने के लिए शिखा प्रतिबद्ध थी ! ननद की शादी, देवर की पढ़ाई, सास का ऑपरेशन, भांजे भांजियों के जन्म पर कभी छोछक तो ननद की ससुराल में उसकी भतीजी के विवाह में रीति रिवाजों और परम्पराओं के अनुसार कभी भात की व्यवस्था इत्यादि करने में शिखा सदैव धीरज के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ी रही ! ऐसे में अपनी महत्वाकांक्षाओं को भूल जाने के सिवाय उसके पास अन्य कोई विकल्प नहीं था ! इस बीच उसके अपने परिवार में भी अरुण और वरुण दो बेटों का आगमन हो गया था ! कभी भूली बिसरी महत्वाकांक्षाएं फिर से सर उठातीं भी तो सभी यह कह कर उसे चुप करा देते, ” अब अपनी पढ़ाई की बात सोच रही हो कि बच्चों के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए ! “ और शिखा फिर मायूस हो जाती !
लेकिन आज सरोज से हुई इस छोटी सी भेंट ने उसके मन में हलचल मचा दी थी ! मन में एक हूक सी उठ रही थी ! उसकी पढ़ाई पूरी हो जाती तो और जल्दी शादी न की जाती तो आज उसका भी समाज में ऐसा ही मान सम्मान और रुतबा होता ! आँखों से क्षोभ के आँसू उमड़ते ही जा रहे थे ! उसे रचना भाभी की प्रतीक्षा थी ! शिखा से सारी बाते सुनने के बाद रचना गंभीर हो गयी थी, “ शिखा मैं तुम्हारे मन की पीड़ा बाँट तो नहीं सकती ना ही तुम्हें तुम्हारा अभीष्ट कैरियर दिलाने में सक्षम हूँ ! लेकिन एक बात तुमसे ज़रूर पूछना चाहती हूँ क्या तुम्हारे लिए मात्र धनोपार्जन में ही शिक्षा की सार्थकता है ? क्या जीवन को केवल भैतिक स्तर पर रख कर सुख-दुःख के तराजू में तोला जाना चाहिए? भावनात्मक पहलू का कोई मोल, कोई महत्त्व नहीं होता ? “


( रचना ने शिखा को क्या परामर्श दिया यह मैं आपको अगली कड़ी में बताउँगी ! पाठक शिखा को क्या सलाह देंगे मुझे इसकी आतुरता से प्रतीक्षा है ! कृपया अपनी प्रतिक्रया से मुझे अवश्य अवगत करायें और शिखा के साथ-साथ मेरा भी मार्गदर्शन करें ! )
क्रमश:

Tuesday, September 14, 2010

* कस्तूरी-मृग * भाग २

अभी तक आपने पढ़ा –
शिखा बाज़ार से लौटी है ! घर पर सब उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं खाने की मेज़ पर ! लेकिन वह माँ से खाने के लिए मना कर अनमनी सी ऊपर चली जाती है ! शिखा की भाभी रचना उससे बात करना चाहती है ! शिखा भी रचना से बात करना चाहती है क्योंकि वह भी अपनी हर समस्या के समाधान के लिए रचना पर ही निर्भर रहती है ! वह रचना से काम समाप्त कर ऊपर आने के लिए कहती है !
अब आगे ----
रेडीमेड कपड़ों की दूकान पर पुरानी सहपाठिनी सरोज से एक छोटी सी मुलाक़ात ने शिखा के शांत मन में आज उथल-पुथल मचा दी थी ! शिखा अपने बेटे वरुण के लिए एक टी शर्ट खरीदने गयी थी ! बजट उसका बहुत सीमित था और सेल्समैन टी शर्ट्स बहुत मँहगे-मँहगे दिखा रहा था ! जो उसे पसंद आतीं वह बजट से बाहर जा रही थीं और जो पर्स की सीमा में फिट बैठ रही थीं उनका कपड़ा बहुत मामूली सा था या डिजाइन आकर्षक नहीं थे ! सेल्समैन भी कपड़े दिखा-दिखा कर अब ऊब चुका था ! शिखा ने महसूस किया था कि अब उसकी बनावटी विनम्रता भी उसकी खीझ को छिपा नहीं पा रही थी ! शिखा भी बहुत असहज सी हो रही थी ! इस अप्रिय स्थिति से उबरने के लिए उसने जल्दी से 35 रुपये की एक टी शर्ट ही पसंद कर ली ताकि वह जल्दी से इस दूकान से बाहर निकल सके ! पेमेंट करने के लिए उसने पर्स खोला ही था कि एक शानदार शेवरलेट कार दूकान के सामने आकर रुकी ! कार से उतर कर एक गरिमामय संभ्रांत महिला ने दूकान में प्रवेश किया ! महिला के साथ एक आया थी जो शायद उनके बेटे को गोद में लिए थी ! महिला के प्रवेश के साथ ही दूकान में मिलिट्री अनुशासन सा माहौल व्याप्त हो गया !
" आइये मैडम आइये ! बड़े भाग्य ! आज तो आपने बड़े दिनों में दर्शन दिए ! “ बही खाते का हिसाब-किताब छोड़ दूकान का मालिक दोनों हाथ जोड़े अत्यंत विनीत मुद्रा में मैडम जी की अभ्यर्थना में व्यस्त हो गया ! सारे कर्मचारी सावधान की मुद्रा में आ गए ! एक कर्मचारी आगंतुका के स्वागत में दौड़ कर ट्रे में ठन्डे पानी के दो गिलास ले आया ! शिखा से पेमेंट लेने की इस समय किसी को फुर्सत नहीं थी ! उपेक्षित सी हो उसने हाथ में पकड़े रुपये पुन: पर्स में रख लिए !
“ कुछ अच्छे से सूट दिखाओ बाबा के लिए ! “ मैडम ने पानी का खाली गिलास ट्रे में रखते हुए आया की गोद में सवार अपने पुत्र की ओर संकेत किया ! सेल्समैन काउंटर पर फैले उन्हीं कपड़ों में से कुछ दिखाने का उपक्रम कर ही रहा था कि हाथ से सारे कपड़ों को एक ओर सरका दूकान के मालिक ने आँखों ही आँखों में उसे तरेर कर घुड़का और ऊपर से मुस्कुराते हुए बड़ी मीठी आवाज़ में सलाह की एक गाँठ थमा दी, “ ग्राहक को देख कर माल दिखाया कर बेटा ! जा अंदर से नया माल लेकर आ ! “ व्यस्त भाव से दो तीन लड़के अंदर घुस गए और बच्चों के कपड़ों के कई डिब्बे लेकर बाहर आये ! दूकान का मालिक अब खुद मैडम को कपड़े दिखा रहा था !
“ देखिये मैडम ! एकदम फ्रेश माल है ! कल ही आया है ! पहली बार आपके लिए ही गाँठ खुलवाई है ! “
दूकानदार की बातों ने शिखा को अपदस्थ कर दिया था ! वह बहुत संकुचित हो उठी थी ! जल्दी से पेमेंट कर वह वहाँ से निकल जाना चाहती थी, “ आप जल्दी से पेमेंट ले लीजिए ! मुझे देर हो रही है ! “ वह कुछ झल्ला कर बोली !
“ बस एक मिनिट बहनजी ! “ की टालमटोल वाली शब्दावली शिखा की ओर उछाल दूकान का मालिक पुन: ऊँचे दामों वाले फ्रेश माल की प्रदर्शिनी और अपने वाक्चातुर्य से मैडम को प्रभावित करने में व्यस्त हो गया !
तभी आया की गोद से उछल कर मैडम के नन्हे से शिशु ने वरुण के बाल कस कर पकड़ लिए ! “आई मम्मी “ वरुण की करूण पुकार सुन शिखा का ध्यान अपने बेटे की ओर गया ! शिखा बेहद झुँझला गयी थी ! फिर भी उसने धैर्य रख कर धीरे से बच्चे की मुट्ठी से वरुण के बाल छुड़ाये और घूर कर आया को आँखों ही आँखों में झिड़का !
“ सॉरी मैडम ! “ आया अपनी असावधानी पर शर्मिन्दा सी थी ! इस सारे हंगामे की वजह से मैडम का ध्यान अब शिखा की ओर आकृष्ट हुआ ! दोनों की दृष्टि मिली और दोनों ही जैसे एक दूसरे के चेहरे पर भूली बिसरी पहचान के चिन्ह ढूँढने में जुट गयीं !
“ तुम ... तुम शिखा हो ना ? “ मैडम ने शिखा की ओर उत्सुकता से निहारा !
“ और तुम ..... आप सरोज हैं ना ? “ परिचय अपरिचय के असमंजस में डूबी शिखा के मुख से निकला ! अब दुकानदार भी इस लघु नाटिका में रस लेने लगा था !
“ आप दोनों क्या एक दूसरे को जानती हैं ? " शिखा को मैडम का परिचय देते हुए उसने बताया , “ आप हैं श्रीमती सरोज वर्मा ! यहाँ की ए डी एम ! " लेकिन दोनों ने जैसे उसकी बातों को सुना ही नहीं ! कुछ देर पहले जो शिखा क्षोभ, कुंठा और झुँझलाहट से ग्रस्त वहाँ से जल्दी से जल्दी निकल जाने के लिए व्याकुल थी अब बच्चों की तरह उल्लसित हो सरोज को दोनों हाथों से पकड़ खुशी के मारे झकझोर रही थी !
“ तुम कितनी बदल गयी हो ! मैं कैसे पहचानती तुम्हें ? घर चलो ना ! माँ तुम्हें देख कर कितनी खुश होंगी ! “ वह कहे जा रही थी !
“ नहीं शिखा आज नहीं ! फिर किसी दिन आऊँगी ! ये क्लब जाने के लिए मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे ! आज वहाँ फ्लावर शो का प्राइज़ डिस्ट्रीब्यूशन है ! मुझे ही चीफ गेस्ट बनाया है ! वहाँ तो जाना ही पड़ेगा ! और तुम सुनाओ क्या कर रही हो आजकल ? “
अचानक शिखा फिर संकुचित हो उठी थी, “ कुछ नहीं सरोज घर गृहस्थी सम्हाल रही हूँ ! इन्हें महिलाओं का नौकरी करना पसंद ही नहीं है इसलिए अपने आप को घर तक ही सीमित कर लिया है ! “ शिखा की आवाज़ में मायूसी और क्षोभ के स्वर प्रतिध्वनित हो रहे थे ! लेकिन तुरंत ही सायास अपनी उदासी की गर्त से बाहर निकल हँसते हुए उसने सरोज से पूछा, “ और अपने बैच की बाकी सहेलियों के बारे में भी कुछ पता है ? कहाँ हैं वे सब ? शिवानी, रूपा, पारुल, कविता, निर्मला ? मेरी शादी तो सबसे पहले ही हो गयी थी ! फिर किसी से मिलना ही नहीं हुआ ! “
“ शिवानी तो होशंगाबाद में लेबर जज है आजकल ! रूपा डिग्री कॉलेज में लेक्चरर हो गयी है ! पारुल शादी के बाद स्टेट्स चली गयी अपने हसबैंड के साथ ! कविता ने अपना ब्यूटी पार्लर खोल लिया है ! और निर्मला फैशन डिजाइनर का डिप्लोमा कर यहीं पर अपना बुटीक चला रही है ! सभी कुछ न कुछ कर रही हैं ! तुम भी कुछ कर डालो ना ! दिन भर घर में वही नीरस काम धन्धे करते-करते बोर नहीं हो जातीं तुम?” दोनों सहेलियां बातों में तल्लीन अपने आस पास के परिवेश को जैसे भूल ही गयी थीं ! मौके का फायदा उठा दुकानदार ने उन दोनों के लिए कोल्ड ड्रिंक्स मँगवा ली, “ लीजिए ना मैडम ! कुछ ठंडा ले लीजिए ! आज गर्मी बहुत है ! “
शिखा तुरंत ही यथार्थ के धरातल पर उतर आई थी ! यह स्वागत ए डी एम साहिबा का हो रहा था उसका नहीं ! उसने शालीनतापूर्वक मना करते हुए चलने का उपक्रम किया, “ आप पेमेंट ले लीजिए ! मैं अब चलूँगी ! अच्छा सरोज घर पर आना ! “
“ ठहरो शिखा मैं भी चल रही हूँ ! मैं तुम्हें तुम्हारे घर पर ड्रॉप कर दूँगी ! “
“ नहीं सरोज मुझे अभी कहीं और भी जाना है ! अभी तो मैं कुछ दिन और हूँ यहाँ ! फिर मिलेंगे ! “
दोनों साथ ही पेमेंट के लिए काउंटर पर पहुँचीं ! सरोज के 800 रुपये के बिल के आगे अपना नगण्य सा 35 रुपये का बिल एक बार फिर से उसे अनावृत कर गया था ! और फिर वरुण का हाथ थाम दूकान की सीढियाँ उतरने के बाद शिखा ने एक बार भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा !
क्रमश:

Sunday, September 12, 2010

* कस्तूरी-मृग *

आज अपने पुराने संकलन से एक कहानी चुन कर आपके सामने प्रस्तुत करने जा रही हूँ ! आशा है आप इसे ज़रूर पसंद करेंगे !

* कस्तूरी-मृग *

“ लो शिखा भी आ गयी ! अब लगा लो सबका खाना बहू ! जल्दी से काम निबटा लो ! शिखाssssss जल्दी से कपडे बदल कर आ जा बेटी ! देख मैंने आज तेरी पसंद के दही बड़े और कटहल के कोफ्ते बनाए हैं ! ठन्डे हो जायेंगे तो सारा मज़ा खराब हो जाएगा ! “
माँ का उल्लसित स्वर सारे घर में गूँज रहा था ! लाडली बेटी जब-जब ससुराल से मायके आती उनकी सारी बीमारी, बुढापा, ब्लड प्रेशर सब कोसों दूर भाग जाते ! हर रोज शिखा की पसंद का कोई न कोई व्यंजन बना कर उसे खिलाने में उन्हें अपूर्व सुख मिलता ! लेकिन आज माँ के प्यार भरे आग्रहपूर्ण निमंत्रण को शिखा ने बड़े अनमनेपन से अस्वीकार कर दिया था !
“ नहीं माँ आज खाने का मन नहीं है ! मेरे दही बड़े फ्रिज में रख दीजियेगा ! मैं सुबह खा लूंगी ! बहुत थक गयी हूँ ! सोने जा रही हूँ ! आप सब खाना खा लीजिए ! वरुण को भी नींद आ रही है ! उसे सुला देती हूँ ऊपर जाकर ! “ और बिना इधर उधर देखे शिखा जल्दी जल्दी सीढियाँ चढ़ गयी थी ! माँ के उत्साह को जैसे पाला मार गया था ! कातर भाव से उन्होंने बहू रचना की देखा, “देखो तो बहू ! जाने क्या बात है ? बाज़ार गयी थी वरुण के लिए कपडे लाने ! ऐसा क्या खा लिया कि भूख ही नहीं है ? जी तो ठीक है उसका ? क्या लाई है कुछ दिखाया भी नहीं ! ”
माँ का आकुल संभाषण समाप्त होने से पहले ही रचना शिखा के पीछे-पीछे ऊपर उसके कमरे में पहुँच गयी थी !
उदास अनमनी शिखा बिना कपड़े बदले ही अपने पलंग पर लेटी खिड़की के बाहर झाँक रही थी ! पास ही शिखा का छोटा बेटा वरुण सोया हुआ था !
“क्या बात है शिखा ! खाना क्यों नहीं खा रही हो ? तबीयत तो ठीक है ना ? “ रचना ने शिखा का माथा छूकर कहा !
“ कुछ नहीं भाभी ! आज दीपाली के यहाँ गयी थी ना उसने बहुत खिला दिया इसलिये भूख नहीं है ! आप सब लोग खा लीजिए ना ! मुझे बहुत नींद आ रही है ! “
शिखा ने करवट बदल मुंह फेर लिया था ! बात खत्म होते-होते स्वर की कसावट भी बिखर गयी थी ! आँखों से उमड़ती नदी को तो शिखा ने मुँह फेर कर छिपा लिया था लेकिन आवाज़ के कंपन को वह दबा नहीं सकी थी ! शिखा की विह्वलता ने रचना को चिंतित कर दिया ! उसने यत्नपूर्वक शिखा का चेहरा अपनी ओर घुमा कर उसे तीक्ष्ण दृष्टि से निहारा,
“सच बताओ शिखा क्या बात है ! क्या मुझसे भी दुराव रखना शुरू कर दिया है ?” रचना की आवाज़ भी तरल होने लगी थी ! उसने शिखा के बालों में हाथ फेर उसका मुख अपनी गोद में छिपा लिया ! प्यार और आत्मीयता की उष्मा पा शिखा का मन पिघल उसकी आँखों से बहने लगा ! रचना और शिखा दोनों हमउम्र थीं और दोनों में प्रगाढ़ प्रेम था ! रचना मात्र शिखा की भाभी ही नहीं उसकी परम प्रिय सखी तथा आयु, ज्ञान और अनुभव में उससे बड़ी होने के नाते उसकी गुरु भी थी ! अपने उचित मार्गदर्शन से अक्सर ही उसने शिखा को समय-समय पर असमंजस और संशय की परिस्थितियों से उबारा था !
“आपसे कैसे छिपाउँगी भाभी ! आपसे नहीं कहूँगी तो मुझे राह कौन दिखायेगा ! “
एक गहरी साँस लेकर शिखा ने कहा , “लेकिन अभी नहीं ! आप सबको खाना खिला आइये ! माँ को भी समझा दीजियेगा ! वे मुझे इस मूड में देखेंगी तो बहुत दुखी होंगी ! मैं आपकी प्रतीक्षा कर रही हूँ ! “
रचना शिखा की बात मान व्यस्त भाव से नीचे तो उतर गयी थी लेकिन उसके मन का बोझ बढ़ गया था ! ऐसा क्या हो गया था कुछ ही घंटों में कि हर वक्त चहकती रहने वाली चुलबुली और खुशमिजाज शिखा अचानक इस तरह उदास और बिखरी हुई सी लग रही थी ! वह जल्दी-जल्दी काम समाप्त कर शिखा के पास पहुँच जाना चाह्ती थी !

क्रमश:

Thursday, September 9, 2010

* ज़रा ठहरो *

ज़रा ठहरो !
तुम इनको न छूना,
ये एक बेहद पाकीजा से रिश्ते के
टूट कर बिखर जाने से
पैदा हुई किरचें हैं जिन्हें छूते ही
धारा प्रवाह खून बहने लगता है ,
डरती हूँ तुम्हारे छू लेने से
कहीं इनकी धार कुंद ना हो जाए,
अगर इनकी चुभन से लहू ही ना बहा
तो इनकी सार्थकता क्या रह जायेगी !

ज़रा ठहरो !
तुम इनको ना मिटाओ,
ये मेरे मन के कैनवास पर
उकेरे गये मेरे अनन्य प्रेम की
मोहक तस्वीरों को बिगाड़ कर
खरोंचने से बने बदनुमा धब्बे हैं
अगर ये मिट गए तो मेरे तो
जीने का मकसद ही खत्म हो जाएगा,
जब 'देखो, ढूँढो पहचानो' का खेल
ही खत्म हो जाएगा तो फिर मैं
इस कैनवास में क्या ढूँढ पाउँगी
और मुझे कैसे चैन आएगा !

ज़रा ठहरो !
तुम इनको ना समेटो,
ये मेरी अनकही, अनसुनी
अनभिव्यक्त उन प्रेम पातियों के
फटे हुए टुकड़े हैं जो कभी
ना भेजी गयीं, ना ही पढ़ी गयीं
लेकिन आज भी मैं दिन भर में
मन ही मन ना जाने कितनी बार
इन्हें दोहराती हूँ और जो आज भी
मेरे जीने का संबल बनी हुई हैं !

ज़रा ठहरो !
अब जब तुम आ ही गए हो
तो मेरे इस अनमोल खजाने
को भी देखते जाओ
जिसमें एक पाकीजा सी मोहब्बत की
चंद यादें, चंद खूबसूरत तस्वीरें,
ढेर सारे आँसू, ढेर सारी चुभन
चंद फटे खत और पुरानी डायरी के
जर्जर पन्नों पर दर्द में डूबी
बेरंग लिखावट में धुली पुछी
चंद नज्में मैंने सहेज रखी हैं !
इन्हें जब जब मैं बहुत हौले से
छू लेती हूँ, सहला लेती हूँ
तो इनका स्पर्श मुझे याद दिला देता है
कि मैं आज भी ज़िंदा हूँ और
मेरा दिल आज भी धड़कता है !

साधना वैद

Friday, September 3, 2010

* खुद बढ़ी जाती हूँ मैं *

ना कोई आवाज़, ना आहट, ना कदमों के निशाँ
साथ अपने साये के गुमसुम चली जाती हूँ मैं !

राह में मुश्किल बहुत सी हैं खड़ी यह है पता,
तुम न दोगे साथ मेरा बात यह भी है पता,
मैं अकेली ही बहुत हूँ मुश्किलों के वास्ते,
मुँह छिपा कर तुम कहाँ बैठे हो यह तो दो बता !

भावनाओं के भँवर में डूबती जाती हूँ मैं,
वंचनाओं की डगर पर भटकती जाती हूँ मैं,
सूखती जाती हैं कलियाँ आस और विश्वास की,
वेदनाओं की अगन में झुलसती जाती हूँ मैं !

पर मुझे अब कोई भी विप्लव डरा सकता नहीं,
कोई भी तूफ़ान मेरा सर झुका सकता नहीं,
मैं धधकती आग हूँ सब कुछ जलाने के लिए,
कोई भी आवेश अब तिल भर हिला सकता नहीं !

इस भँवर में डूब कर खुद ही उबर जाती हूँ मैं,
वंचना की कैद से बाहर निकल आती हूँ मैं,
सींच दीं मैंने वो कलियाँ आस और विश्वास की,
अगन में तप कर निखर कर दमकती जाती हूँ मैं !

यूँ किसी के रहम पर जीना मेरी फितरत नहीं,
सर झुका कर याचना करना मेरी आदत नहीं,
दफ़न करके दुःख सारे दर्द की गहराई में ,
थाम कर उँगली स्वयम् की खुद बढ़ी जाती हूँ मैं !

ना कोई आवाज़, ना आहट ना कदमों के निशाँ
साथ अपने साये के गुमसुम चली जाती हूँ मैं !

साधना वैद