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Friday, July 22, 2011

मुझे अच्छा लगता है


दिल की दीवारों पर लिखी

वर्षों पुरानी धुँधली सी इबारतों को

यत्न कर साफ़-साफ़ पढ़ना

मुझे अच्छा लगता है ,

खिले गुलाब की हर पंखुड़ी पर

सम्पूर्ण समर्पण और भावना के साथ

तुम्हारा ‘आई लव यू’ उकेरना

मुझे अच्छा लगता है !

खिडकी की सलाखों पर सिर टिका

इंतज़ार में आँखे बिछाये अधीरता से

घंटों तुम्हारा सड़क को निहारना

मुझे अच्छा लगता है !

बहुत पीछे छूट गये

अपने हमसायों के कदमों की

बेहद धीमी आहट को

कान लगा कर सुनने की कोशिश करना

मुझे अच्छा लगता है !

मन की अतल गहराइयों में कहीं

दबे छिपे विस्मृत प्रणय गीतों की

मधुर पंक्तियों को सायास दोहराना

मुझे अच्छा लगता है ,

कस कर बंद किये गये तुम्हारे

अधरों का कुछ कहने के लिये

तत्पर हो धीमे-धीमे खुलना

मुझे अच्छा लगता है !

ढीली गुँथी चोटी को सामने कर

काँपती उँगलियों से तुम्हारा

बार-बार उसे खोलना और गूँथना

मुझे अच्छा लगता है ,

किसी सवाल के जवाब में

तुम्हारा अपने दुपट्टे के छोर को

दाँतों से दबाना और

सलज्ज पलकों को ऊपर उठा

अपनी मौन दृष्टि को मेरे चहरे पर

गहराई तक रोप देना

मुझे अच्छा लगता है !

इन मीठी यादों को सहेजना ,

समेटना और फिर से जी पाना

मुझे अच्छा लगता है ,

बस बदलते समय के साथ

बदलते परिवेश में

प्रणय निवेदन के बदलते प्रतिमानों

और बदलती परिभाषा के साथ

समझौता करना

मुझे अच्छा नहीं लगता !

साधना वैद