Followers

Saturday, July 30, 2011

एक अकम्पित लौ


तुम्हारी यादों का सिरहाना लगाये,

तुम्हारे ख्यालों की चादर को

कस कर अपने जिस्म से लपेटे,

तुम्हारी छवि को आँखों में बसाये,

तुम्हारी बातों की रातरानी सी

महकती भीनी-भीनी खुशबू की

स्मृति से मन प्राण को

आप्लावित कर,

तुम्हारी आवाज़ के अमृत से

अपनी आत्मा को सींचती हूँ !

जाने कितने मुकाम उम्र के

अब तक पार कर लिये हैं

याद नहीं !

किसी मंदिर में प्रज्वलित

अखण्ड ज्योति की तरह

अपने मन के निर्जन कक्ष में

शाश्वत अकम्पित लौ की तरह

मैं सदियों से हर पल

हर लम्हा आज भी प्रदीप्त हूँ

कभी ना बुझने के लिये

और हर क्षण राख बन

स्वयं को उत्सर्जित

करने के लिये !



साधना वैद