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Tuesday, July 5, 2011

सचमुच तुम केवल पत्थर हो


सचमुच तुम केवल पत्थर हो !

इतनी सारी धन दौलत पर बैठे हो अधिकार किये ,
निर्धन जनता सहती जाती हर दुःख विपदा अधर सिये ,
कैसे सह लेते हो अपने भक्तों की इतनी पीड़ा ,
यह सब है निर्मम सच्चाई नहीं कोई कंदुक क्रीड़ा !
देख नहीं पाते यदि यह सब कैसे भक्तों के हितकर हो !
सचमुच तुम केवल पत्थर हो !

कैसे प्रतिनिधि भेजे तुमने भक्तों की सेवा करने ,
जो बन बैठे खुद ही 'भगवन', छोड़ा भक्तों को मरने ,
काम, क्रोध, मद, लोभ से जिनकी छूट न पायी कभी लगन ,
रहे देखते अविचल जग को, स्वयं रास में रहे मगन ,
क्या सचमुच तुम ऐसे ढोंगी साधू संतों के अनुचर हो !
सचमुच तुम केवल पत्थर हो !

सोने चाँदी के आसन पर सदा विराजे रहते तुम ,
हीरे, मोती, रत्न, नगों से सदा सुसज्जित रहते तुम ,
मनों भोग चढ़ता है निश दिन क्षुधित जनों के पैसों से ,
जिसे चखा ना तुमने कण भर जुटा भक्त की जेबों से ,
काला, श्वेत बहुत धन जाने, तुम बहुरंगी धन के घर हो !
सचमुच तुम केवल पत्थर हो !

बच्चों को भूखा रख दुखिया माँ मंदिर में अर्चन करती ,
विवश विकलता एक पिता की तेरी देहरी पर सिर धरती ,
क्यों दुःख नहीं बाँटते उनका, बोलो तुम किसका भय है ,
वार नहीं क्यों देते यह धन उर अंतर जो करुण, सदय है ,
लेकिन ऐसा तभी करोगे मन पर पीड़ा से कातर हो !
सचमुच तुम केवल पत्थर हो !


साधना वैद