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Tuesday, August 23, 2011

मंज़िल







बस

फूलों की पंखुड़ी की तरह

एक नाज़ुक सा ख़याल ,

स्पंज की तरह भीगा-भीगा सा

एक चाहत का जज्बा ,

मन पर चहलकदमी करती

अतीत के मधुर पलों को दोहराती

ढेर सारी खट्टी मीठी यादें ,

दिल के टी वी स्क्रीन पर

हर लम्हा बदलती

बीते पलों की बेहद मोहक

खूबसूरत तस्वीरें !

साथ ही लम्बे-लम्बे

अनचीन्हे अनजान रास्ते ,

दूर तक ना तो

मंज़िल का कोई निशान

ना ही कोई पहचान ,

ना कोई आवाज़

ना ही कोई आहट ,

ना कोई रोशनी की किरण

ना ही किसी विश्वास का उजाला !

समय की गीली रेत पर

तुमने जो निशाँ छोड़े थे

उनकी नमी

मौसमों के प्रखर ताप ने

सारी की सारी

ना जाने कब सोख ली और

वो हालात की आँधी के साथ

उड़ कर अब तो मिट भी गये !

इस गुमनाम सफर की

मंज़िल कहाँ है ,

राह में पड़ाव कहाँ हैं ,

और मेरा लक्ष्य कहाँ है ,

मुझे कुछ तो बताओ !



साधना वैद