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Tuesday, September 6, 2011

जाने क्यों







जाने क्यों आज भी

भागता है मन उन

परछाँइयों के पीछे

जो वर्षों पहले उँगली छुड़ा कर

मुझसे इतनी दूर जा चुकी हैं

कि अब ना उनका मुझ तक

लौटना मुमकिन है

ना ही मेरा उन तक

पहुँचना सम्भव है !

जाने क्यों तरसते हैं कान

सदियों पहले हवाओं में

विलीन हो चुकी उस आवाज़ की

प्रतिध्वनि को सुनने के लिये

जो पता नहीं कैसे भूल से

एक बार मेरे नाम को

शायद अनजाने में ही

उच्चारित कर गयी थी और

अब काल के गह्वर में

कहीं डूब कर रह गयी है !

जाने क्यों युगों पहले

अपनी हथेली पर गिरे

उस एक आँसू की नमी से

मैं अपने मन की बगिया के

मुरझाये पौधे को सींचने की

कोशश में आज भी जुटी हूँ

जो कदाचित

किसी और की पीड़ा से

द्रवित होकर मेरी हथेली पर

छलक पड़ा था और

जिसकी उष्मा ने

उस एक पल में

मुझे समूचा ही

पिघला दिया था !

जाने क्यों आज तक

समझ नहीं पाई कि

आसमान में उड़ने वाले

स्वच्छंद पंछी कभी

पिंजरे में क़ैद होकर

रहना नहीं जानते,

कि पर्वत से उतरने वाली धारा

कभी अपनी दिशा बदल

पलट कर वापिस

पर्वत पर नहीं चढ़ती,

कि शाख से टूट कर

विच्छिन्न हुआ फूल

कभी लौट कर दोबारा

शाख पर नहीं खिलता !

साधना वैद