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Saturday, September 17, 2011

जश्न


पलक के निमिष मात्र से

क्षितिज में उठने वाले

प्रलयंकारी तूफान को तो

शांत होना ही था ,

तुम्हें बीहड़ जंगल में

अपनी राह जो तलाशनी थी !

गर्जन तर्जन के साथ

होने वाली घनघोर वृष्टि को भी

तर्जनी के एक इशारे पर

थमना ही था ,

तुम्हें चलने के लिये पैरों के नीचे

सूखी ज़मीन की ज़रूरत जो थी !

सागर में उठने वाली सुनामी की

उत्ताल तरंगों को तो

अनुशासित होना ही था ,

तुम्हारी नौका को तट तक

जो पहुँचना था !

ऊँचे गगन में

अपने शीर्ष को गर्व से ताने

सितारों की हीरक माला

गले में डाले उस पर्वत शिखर को भी

सविनय अपना सिर झुकाना ही था

कीर्ति सुन्दरी को उसका यह हार

तुम्हारे गले में जो पहनाना था !

राह की बाधाओं को तो

हर हाल में मिटना ही था

तुम्हें मंजिल तक जो पहुँचना था !

सांध्य बाला को भी अपने वाद्य के

सारे तारों को झंकृत करना ही था ,

उसे तुम्हारी स्तुति में

सबसे सुन्दर, सबसे मधुर,

सबसे सरस और सबसे अनूठे राग में

एक अनुपम गीत जो सुनाना है

तुम्हारी जीत के उपलक्ष्य में !

जीत का यह जश्न तुम्हें

मुबारक हो !



साधना वैद