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Monday, September 26, 2011

तुम आते तो......


तुम आते तो मन को ज्यों धीरज मिल जाता ,

रिसते ज़ख्मों पर जैसे मरहम लग जाता ,

सुधियों के सारे पंछी नभ में उड़ जाते ,

भावों के तटबंध टूट जैसे खुल जाते !

मन उपवन की मुरझाई कलिका खिल जाती ,

शब्दों को कविता की नव नौका मिल जाती ,

ह्रदय वाद्य पर जलतरंग जैसे बज जाती !

अंतर की सब पीड़ा गीतों में बह जाती ,

जीवन को जीने का ज्यों सम्बल मिल जाता ,

नयनों को सपने जीने का सुख मिल जाता ,

तुम आते तो धड़कन को साँसें मिल जातीं ,

भटके मन को मंजिल की राहें मिल जातीं !

ना आ पाये तब भी कोई बात नहीं है ,

मन मर्जी है यह कुछ शै और मात नहीं है ,

मैंने भी मन को बहलाना सीख लिया है ,

जो कुछ तुमने दिया उसे स्वीकार किया है !

सब कुछ कितना खाली-खाली सा लगता है ,

हर सुख हर सपना जैसे जाली लगता है ,

लेकिन मैंने छल को जीना सीख लिया है ,

विष पीकर अमृत बरसाना सीख लिया है !

साधना वैद