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Thursday, January 31, 2013

दो जिद्दी पत्ते







पतझड़ की बेरहम   
मार के बाद भी
ना जाने कहाँ से
आशा और अभिलाषा के
दो जिद्दी पीले पत्ते  
सबसे ऊँचे दरख़्त की   
सबसे सूखी शाख पर
पता नहीं क्यों
अटके रह गए हैं !
मैं पेड़ के नीचे
अपना आँचल फैलाये
धूप में सिर्फ इसीलिये खड़ी हूँ
कि ज़मीन पर गिरने
की बजाय उन्हें
मैं अपने
आँचल में समेट लूँ !
चाहती हूँ कि उन्हें   
मेरे आँचल का
आश्रय मिल जाये
वरना वक्त की
निर्मम धूप में जले
ये सूखे सुकुमार पत्ते
अगर टूट कर
ज़मीन पर गिर गये
तो पैरों के नीचे
रौंदे जाकर
चूर-चूर हो जायेंगे
और उनका यह हश्र
मैं बर्दाश्त नहीं
कर पाऊँगी
और मैं
जानती हूँ कि
किसी भी पल
उनका टूट कर
झड़ जाना तय है !

साधना वैद