Followers

Tuesday, February 5, 2013

लम्हा भर रोशनी



आँखों पर कस कर
हालात की काली पट्टी बाँध
जिन्दगी ने
घुप अँधेरे में
अनजानी अनचीन्ही राहों पर
जब अनायास ही
धकेल दिया था
तब मन बहुत घबराया था !
व्याकुल विह्वल होकर 
सहारे के लिए
मैंने कितनी बार पुकारा था,
लेकिन मेरी
हर पुकार अनुत्तरित ही
रह जाती थी !
अवलम्ब के लिये
आस पास कोई दीवार,
कोई लाठी ,
कोई सहारा भी ढूँढ
नहीं पाती थी !
ह्रदय की आकुलता का
शमन करने के लिए
आश्वस्त करता  
कोई मृदुल हाथ
अपने माथे पर रखा
नहीं पाती थी !
निर्जन नीरव शून्य में फ़ैली
निरुपाय बाँहों को
किन्हीं चिर परिचित उँगलियों का
जाना पहचाना
स्पर्श नहीं मिलता था !
कैसे आगे बढूँ,
कहाँ जाऊँ
किस दिशा में कदम उठाऊँ
कोई भी तो नहीं था
जो रास्ता बता देता !
हार कर खुद ही उठ कर
अपनी राह बनाने के लिये
स्वयं को तैयार किया !
गिरते पड़ते
ठोकर खाते
कितनी दूर चली आई हूँ
नहीं जानती !
लेकिन कुछ समय के बाद
ये अँधेरे ही
अपने से लगने लगे थे!
पैरों की उँगलियों से
टटोल कर नुकीले पत्थर
और काँटों की पहचान
कर लेना भी सीख लिया था !
हवाओं के खामोश
इशारों की फितरत भी
समझ में आने लगी थी !
और फिर धीरे-धीरे
मुझे इन अंधेरों की
आदत पड़ गयी 
ये अँधेरे मेरे एकाकी 
व्यक्तित्व का 
अविभाज्य अंग बन गये !
अँधेरे के बिस्तर पर 
अँधेरे की चादर ओढ़ 
खामोशी से आँख बंद कर 
लेटे रहने में
बड़ा सुकून सा मिलता था !
युग युगांतर के बाद
मेरी आँखों से
आज जब यह पट्टी उतरी है
मुझे इस घनघोर तिमिर में
एक जुगनू की
लम्हा भर रोशनी भी
हज़ार सूरजों की ब्रह्माण्ड भर
रोशनी से कहीं अधिक
चौंधिया गयी है
और मैं चकित हूँ 
कि आज इस रोशनी में 
मुझे कुछ भी
दिखाई क्यों 
नहीं दे रहा है !!
 

साधना वैद    

22 comments :

  1. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति,,,
    लम्हा भर रौशनी काफी है आगे बढ़ने के लिए,,,

    RECENT POST LINK बदनसीबी,

    ReplyDelete
  2. हाँ सदियों से बंधी पट्टी जब उतरती है तो बदलाव तेज रौशनी सिर्फ चकाचौंध ही दे पाती है। जिसके हम आदि नहीं होते है तो फिर कैसे देख पायेंगे . सुन्दर भावाभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  3. बहुत खुबसूरत एहसास ,खुबसूरत अभिव्यक्ति
    New post बिल पास हो गया
    New postअनुभूति : चाल,चलन,चरित्र

    ReplyDelete
  4. कि आज इस रोशनी में
    मुझे कुछ भी
    दिखाई क्यों
    नहीं दे रहा है !!
    वक्‍त लगता है ... चाहे हम उजाले से अंधेरों में चलने का प्रयास करें या अंधेरे से उजाले में जायें एकबारगी अकबकाहट अवश्‍य होती ... सार्थक संदेश देती उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति

    ReplyDelete
  5. लगा शब्दों के परिधान में मैं हूँ - कैसे आखिर कैसे मुझे लिख दिया !और इधर उधर से अपने एहसासों को उठा लायी हूँ -
    "आज मैं जो हूँ
    जिस भी मुकाम पर हूँ
    उसमें जितना असर दुआओं का था
    मौसम , आँखों के सपने का था
    उतना ही जबरदस्त असर हादसों का था !"

    "अपमान की आग जब लगी
    तो,
    हाथ सेंकनेवाले अपने ही थे !
    मासूमियत का मुखौटा पहन
    सिहरते हुए,
    घी डालते गए !
    बढती लपटों ने
    कितनी भावनाओं को अपनी चपेट में लिया-
    इससे बेखबर ,
    हाथ सेंकते गए............
    कुछ रहा ही नहीं कहने को,
    और न कुछ अपना लगता है,
    सिवाय उन बातों के -
    जिसका पाठ
    इन्होंने ही पढाया..............!!!!!!"

    ज़िन्दगी हादसों से ना बने, दर्द अपनी शक्ल ना ले ले तो असली रूह भटकती ही रहती है

    ReplyDelete
  6. और मैं चकित हूँ
    कि आज इस रोशनी में
    मुझे कुछ भी
    दिखाई क्यों
    नहीं दे रहा है !!

    निशब्द करती सशक्त अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  7. बहुत ही खुबसूरत अभिव्यक्ति।

    ReplyDelete
  8. कभी अंधेरे भी अपने थे ... आज तेज़ रौशनी से दिल घबराता है .... ज़िंदगी के सफे पलटो तो ...न जाने क्या क्या गुज़र जाता है ....

    बहुत खूबसूरती से मन के भाव लिखे हैं ...

    ReplyDelete
  9. बहुत ही खूबसूरत शब्द चयन है कविता में .बेहद सम्वेदंयुक्त विचार बधाई

    ReplyDelete
  10. मुझे इस घनघोर तिमिर में
    एक जुगनू की
    लम्हा भर रोशनी भी
    हज़ार सूरजों की ब्रह्माण्ड भर
    रोशनी से कहीं अधिक
    चौंधिया गयी है
    बेहतरीन अभिव्यक्ति..

    सादर
    अनु

    ReplyDelete
  11. "लम्हा भर रौशनी काफी है आगे बढ़ाने के लिए "|बहुत शानदार भावपूर्ण अभिव्यक्ति |
    आशा

    ReplyDelete
  12. रोशनी का एक कतरा
    दिखाती है राह
    हरदम हरपल
    एक शानदार अभिव्यक्ति
    सादर

    ReplyDelete
  13. शानदार ...


    ब्लॉग बुलेटिन: ताकि आपकी गैस न निकले - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  14. बहुत सुन्दर रचना | भावों की अभिव्यक्ति उत्तम है | आभार

    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

    ReplyDelete
  15. अदभुत--बहुत सुंदर
    बहुत बहुत बधाई

    ReplyDelete
  16. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 07-02 -2013 को यहाँ भी है

    ....
    आज की हलचल में .... गलतियों को मान लेना चाहिए ..... संगीता स्वरूप

    .

    ReplyDelete
  17. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  18. बहुत बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति ...... दिल के भीतर तक उतर गयी ....
    ~सादर!!!

    ReplyDelete
  19. अचानक मिली रोशनी के अनुकूल बनने में दृष्टि को समय लगता है.धीरे-धीरे, थोड़ा सध कर सब स्पष्ट होने लगता है.

    ReplyDelete
  20. खुबसूरत एहसास, सुन्दर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete