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Monday, April 29, 2019

रफूगिरी



सारी ज़िंदगी
मरम्मत करती रही हूँ
फटे कपड़ों की
कभी बखिया करके
तो कभी पैबंद लगा के
कभी तुरप के
तो कभी छेदों को रफू करके !
धूप की तेज़ रोशनी और  
साफ़ नज़र की कितनी
ज़रुरत होती थी उन दिनों
सुई में धागा पिरोने के लिए
और सफाई से सीने के लिए !
मरम्मत तो अब भी
करती ही रहती हूँ
कभी रिश्तों की चादर में
पड़े हुए छेदों को
रफू कर जोड़ने के लिए  
तो कभी ज़िंदगी के
उधड़ते जा रहे लम्हों को
तुरपने के लिए
कभी विदीर्ण मन की
चूनर पर करीने से
पैबंद लगाने के लिए
तो कभी भावनाओं के
जीर्ण शीर्ण लिबास को  
बखिया लगा कर  
सिलने के लिए !
बस एक सुकून है कि
इस ढलती उम्र में
यह काम रात के
निविड़ अन्धकार में ही
बड़े आराम से हो जाता है
इसके लिए मुझे
किसी सुई धागे और
तेज़ रोशनी की
ज़रुरत नहीं होती !

साधना वैद   


16 comments :

  1. रिश्तों को रफू करना कोई आसान तो नहीं । वो भी आप भावनाओं से अंधेरे में अकेले ही उधेड़ बुन कर रफुगिरी करती हैं । सुंदर अभिव्यक्ति ।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (01-05-2019) को "संस्कारों का गहना" (चर्चा अंक-3322) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 30/04/2019 की बुलेटिन, " राष्ट्रीय बीमारी का राष्ट्रीय उपचार - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. बेहतरीन रचना आदरणीय दी जी
    सादर

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  5. बहुत शानदार रचना है |

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  6. बेहतरीन रचना ,सादर नमस्कार

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  7. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्रीजी!

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  8. आपका तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया शिवम् जी! हार्दिक आभार !

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  9. हार्दिक धन्यवाद अनीता जी!

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  10. हार्दिक धन्यवाद जीजी!

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  11. दिल से शुक्रिया सु-मन जी !

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  12. हार्दिक धन्यवाद कामिनी जी!

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  13. हृदय से आपका बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार संगीता जी !

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  14. भावनाओ को रफू करने के लिये कब रोशनी और सुई-धागे की जरूरत पड्ती है भला

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  15. हार्दिक धन्यवाद वर्मा जी! आभार आपका !

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