Followers

Thursday, April 4, 2019

प्रेमाश्रु


मेरे अंतर्मन के देवालय में
चंद कलश बड़े प्यार से
सहेज कर रखे हैं मैंने !
जानते हैं क्या है उनमें ?
उनमें बड़े कीमती मोती हैं
प्रेमाश्रुओं के मोती
जिनका मोल संसार का
पारखी से पारखी जौहरी भी
नहीं लगा सकता !

इनमें से एक कलश में  
भरे हैं आँसू मेरी माँ के
जो मेरे जन्म से लेकर आज तक
मेरी हर व्याधिहर कष्ट,
हर चोट पर चिंतित होकर  
ना जाने कितनी बार
आकुल व्याकुल होकर
नयनों के रास्ते बहते रहे हैं !

दूसरे कलश में भरे हैं आँसू
मेरी प्यारी दीदी के
जो मेरे मन में धधकती
ज्वाला के शमन के लिए
गाहे बगाहे बरबस ही
बरस पड़ते थे और बड़े प्यार से
उनसे आचमन कर मैं अपनी
सारी दुविधा सारे संशय
भूल जाया करती थी !

तीसरे कलश में बहुत थोड़े हैं
लेकिन सबसे कीमती प्रेमाश्रु हैं
जो हैं मेरे बाबूजी के
जो उनकी छात्र छाया से
दूर हो जाने पर परदेश में
मेरी पीड़ा के अनुमान मात्र से
यदा कदा उनके नेत्रों में
छलक आया करते थे
और कोई देख ले  
उससे पहले ही वे उन्हें
सुखा दिया करते थे !

चौथे कलश में आँसू हैं
हर रंग के जिनमें हैं
प्यार, गुस्सा, ईर्ष्या, क्षोभ,
पश्चाताप और क्षमा के
बहुरंगी आँसू और
यह कलश है मेरे सबसे प्यारे
सबसे अंतरंग छोटे भैया का !

लेकिन इन सबसे अलग
यह जो स्वर्ण कलश है
इसमें संगृहित हैं तुम्हारे आँसू
जो मेरे लिए सबसे अनमोल हैं
क्योंकि उन आँसुओं में
मुझे सदैव अपनी पीड़ा के
प्रतिबिम्ब के स्थान पर
तुम्हारी पीड़ा का प्रतिबिम्ब
दिखाई दिया है 
वो बहे हैं तो सिर्फ मेरे लिए
नितांत विशुद्ध प्रेमवश
इसीलिये वो सबसे विशिष्ट हैं ! 

बस इतनी विनती है
मेरी अंतिम यात्रा से पूर्व
इन प्रेमाश्रुओं से ही
मेरा अंतिम स्नान हो और
गंगाजल के स्थान पर
मेरे मुख में इन्हीं आँसुओं की
चंद बूँदें टपकाई जाएँ क्योंकि
इनसे अधिक निर्मल
इनसे अधिक शुद्ध और
इनसे अधिक पवित्र
इस संसार में अन्य कुछ
हो ही नहीं सकता !



साधना वैद 




14 comments :

उषा किरण said...

बहुत ही भावपूर्ण कविता....❤️

roopchandrashastri said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (05-04-2019) को "दिल पर रखकर पत्थर" (चर्चा अंक-3296) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

yashoda Agrawal said...

बेहतरीन व्याख्या
सादर नमन

akanksha said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण कविता |
आशा

Sweta sinha said...

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ५ अप्रैल २०१९ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

Sadhana Vaid said...

हार्दिक धन्यवाद उषा जी !

Sadhana Vaid said...

आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

Sadhana Vaid said...

हार्दिक धन्यवाद यशोदा जी ! आभार आपका !

Sadhana Vaid said...

तहे दिल से शुक्रिया जीजी ! आभार आपका !

Sadhana Vaid said...

आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी ! स्नेहिल वन्दे !

Anita saini said...

लेकिन इन सबसे अलग
यह जो स्वर्ण कलश है
इसमें संगृहित हैं तुम्हारे आँसू
जो मेरे लिए सबसे अनमोल है...
बेहतरीन रचना आदरणीया
सादर

Sadhana Vaid said...

हार्दिक धन्यवाद अनीता जी ! आभार आपका !

sudha devrani said...

बहुत लाजवाब रचना हमेशा की तरह...

Sadhana Vaid said...

हार्दिक धन्यवाद सुधा जी ! आभार आपका !