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Wednesday, February 29, 2012

यह तो कहो






रोशनी का बहुत पीछे छूटा

एक नन्हा सा कतरा

कितनी दूर तक

मेरी राह रोशन कर पायेगा

यह तो कहो !

दूर बादल की आँख से टपकी

बारिश की एक नन्हीं सी बूँद

सहरा से सुलगते

मेरे तन मन को

कितना शीतल कर पायेगी

यह तो कहो !

प्राणवायु का एक

अदना सा झोंका

जो सदियों बाद

मेरी घुटती साँसों को

नसीब से मिला था

कब तक मुझे

जीवित रख पायेगा

यह तो कहो !

भूलवश मुख से उच्छ्वसित

प्रेम की वंचना से सिक्त

नितांत एकाकी,

निर्बल, अस्फुट सा शब्द

मेरे सुदीर्घ जीवन के

पल पल में संचित

कटुता के विशाल पुन्ज को

निमिष भर में ही

कैसे धो डालेगा

यह तो कहो !

मेरी अवरुद्ध हुई साँसों को,

मेरी मुँदती हुई पलकों को,

मेरी डूबती हुई नब्ज़ को

ज़रूरत है उस आवाज़ की

जो निष्प्राण देह में भी

पल भर में जाने कैसे

जीवन का संचार

कर देती है ,

वह चिर प्रतीक्षित आवाज़

मुझे कब सुनाई देगी

यह तो कहो !

साधना वैद !