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Thursday, August 4, 2011

नीलकंठ का आर्तनाद



हे भक्तों

यह कैसी साँसत में तुमने मुझे डाला है

आज तो तुमने मेरे नाम और

मेरे अस्तित्व को ही

कसौटी पर परखने के लिये

मुझे ही ज़हर के समुद्र में

पटक डाला है !

समुद्र मंथन के समय

समुद्र से निकले हलाहल का

देवताओं के अनुरोध पर जग हित में

मैंने पान तो अवश्य किया था

लेकिन मेरे हिस्से में

आजीवन विष ही विष आएगा

यह आकलन मैंने कब किया था !

जगत वासियों तुमने तो संसार में

भाँति-भाँति के विष बनाने की

अनगिनत रसायनशालायें खोल डाली हैं ,

हलाहल से पूर्णत: सिक्त मेरे कंठ की

सीमा और विस्तार को भी तो जानो

इसमें बूँद भर भी

और समाने के लिये

ज़रा सी भी गुंजाइश

क्या और निकलने वाली है ?

तरह-तरह के अनाचार, अत्याचार ,

दुराचार, व्यभिचार, लोभाचार

भ्रष्टाचार और पापाचार

के रिसाव से यह जग भरता जाता है ,

और इतना अधिक विष

अपने कंठ में सम्हाल न पाने की

मेरी असमर्थता को संसार के सामने

उजागर करता जाता है !

मेरा कंठ ही नहीं आज इस

विष स्नान से मैं सम्पूर्ण ही

नीला हो चुका हूँ ,

और अपनी अक्षमताओं के बोझ तले

अपराध बोध से ग्रस्त हो

अपनी ही दृष्टि में

गिर चुका हूँ !

अगर यही हाल रहा तो

हे जगत वासियों

नीलकंठ होने के स्थान पर

मैं विष के इस नीले सागर में

समूचा ही डूब जाउँगा ,

और अगर विष वमन का

तुम्हारा यह अभियान अब नहीं रुका तो

इस देवलोक को छोड़

अन्यत्र कहीं चला जाउँगा

और इस जगत की रक्षा के लिये

फिर कभी लौट कर नहीं आउँगा !


साधना वैद