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Thursday, January 24, 2019

अम्मा का अवसाद




फूलों के हार के पीछे 
सुनहरे फ्रेम के अंदर   
सजी तस्वीर में
अम्मा के चहरे पर
एक करुण मुस्कान है ,
हॉल में जुटा सारा परिवार
एकत्रित भीड़ के सामने
बिलख-बिलख कर हलकान है !
भगवान की भी यह
कैसी अन्यायपूर्ण लीला है,
अम्माँ का हाथ हमारे
सिर से क्यों छीन लिया
यह आघात हम सब बाल बच्चों 
के लिये कितना चुटीला है !
अम्मा फ्रेम में ही कसमसाईं
तस्वीर के अंदर से झाँकती 
उनकी आँखें घोर पीड़ा से
    छलछला आईं !   
जब सहारे को मैंने
तुम्हारा हाथ माँगा था
तब तो तुम उसे अनदेखा कर गये
मैं ठोकर खा कर नीचे गिर गयी
और तुम आगे को बढ़ गये !
अब किस हक से तुम मेरा हाथ
अपने सर पर माँगते हो,
जब मर्यादा और मानवता की
सारी हदें 
तुम खुद ही लाँघते हो !
मेहनत और किफायत से चल कर
हमने अपने इस परिवार के लिये
एक छोटा सा घर बनाया था
जिस पर अपने बापू जी के जाने बाद
तुमने ही सारा अधिकार जमाया था !
मेरे इस छोटे से घर में नये कमरे और
आधुनिकतम सामान जुड़ते गये ,
निर्जीव वस्तुओं का वर्चस्व बढ़ता गया
और मानवीय रिश्ते पिछड़ते गये !
घर में कार, टी वी, ए सी,
कम्प्यूटर, वाशिंग मशीन,  
सब आ गया,
और इन सबके लिये घर में
जगह बनाने के वास्ते
मुझे घर के सबसे पीछे वाली
कबाड़ की कोठरी में
   पहुँचा दिया गया !  
तुम्हारा नाम समाज के रईसों
की सूची में ज़रूर शुमार हो गया ,
लेकिन मेरा बुढ़ापा वर्षों पुरानी
तुम्हारे बापू की दिलाई
जर्जर हो चुकी 
दो चार फटी साड़ियों को
   मरम्मत कर सिलने सम्हालने  
में ही गुज़र गया !
अब मेरी मिट्टी के लिये
तुम नया थान लाओ या नया शॉल
क्या फर्क पड़ता है
स्वर्ग में बैठे तुम्हारे बापू का दिल
तुम्हारी इस खुदगर्जी के मंज़र को
देख कर दुःख से बहुत तड़पता है !
जानती हूँ यह भी तुम
विवश होकर ही कर रहे हो,
सिर्फ दुनिया में दिखावे के लिये
और समाज में अपनी 
यश सिद्धि के लिये ही
तुम श्रवण कुमार होने का
दम भर रहे हो !
काश ! जितना तुम
मेरी मिट्टी के लिये
अब कर रहे हो उसका
सौवाँ अंश भी मेरे जीवित रहते
मेरे लिये कर देते
तो ऐसी नौबत ही क्यों आती,
मेरी आत्मा इस संसार से
सुखपूर्वक विदा लेती
और प्रत्यक्ष रूप से
जीते जी ही मैं इस जगत में
मोक्ष पा जाती !


  साधना वैद 

  चित्र-गूगल से साभार

Thursday, January 10, 2019

मेरा विकास - देश का विकास




 आ रहे हैं चुनाव   
नेता जी भी आ रहे हैं 
भाषण देने, नई घोषणाएं करने
वादे करने, वोट माँगने और
नए नए नारे लगवाने
हवाई अड्डे से सभास्थल तक
सारी रोड चमक गयी है
गड्ढे भर गए हैं
कूड़ा उठ गया है
रंग रोगन हो गया है
नेताजी के चरण जिन सड़कों पर पड़ेंगे
उनका उद्धार हो गया
समझ लो समूचे शहर का 
उद्धार हो गया !
सिर्फ समझने की ही तो बात है !
अगर समय रहते समझ जायेंगे
आपके सारे संशय, सारे संताप
पलक झपकते ही दूर हो जायेंगे !

चुनाव प्रचार के लिये
चार पाँच शहरों का दौरा हुआ
चार पाँच शहरों के
थोड़े-थोड़े हिस्से चमक गए
समझ लीजिये कि समूचे प्रदेश के
सब हिस्से चमक गए और
स्वच्छ भारत का सपना भी
जैसे पूर्णत: साकार हो गया !
सिर्फ समझना ही तो है
समझ लीजिये ना
इसमें हर्ज़ ही क्या है !

जबसे मंत्री बने हैं
नेताजी ने जनता के भले के लिए
क्या कुछ नहीं किया  
एड़ी चोटी का ज़ोर लगा कर
सब सरकारी सौदे, नौकरियाँ, ठेके, टेंडर
अपने सारे कुटुम्बियों को बँटवा दिये
सब चचेरे, तयेरे, ममेरे, फुफेरे, मौसेरे भाई
सारे बहन बहनोई साले सालियाँ
रातों रात अकूत दौलत के स्वामी हो गये
जो आधे पेट खाना खाकर सोते थे
दो जोड़ी कपड़ों में सारे मौसम गुज़ार देते थे
अब राजा महाराजाओं की तरह
शान शौकत के साथ रहने लगे !

अब यहाँ ज़रा अपनी सोच को
थोड़ा सा माँजने की ज़रुरत है
नेता जी जनता के
जनता नेता जी की
अलग थोड़े ही हैं सब उनके कुटुंब से
कुटुंब के सब लोगों का बैंक बेलेंस बढ़ा
धन दौलत, ज़मीन जायदाद में इजाफा हुआ
समझिये सबका जीवन स्तर सुधर गया
सिर्फ समझने की ही तो बात है
नेताजी के रिश्तेदारों का भला हुआ    
समझ जाइए सबका भला हो गया
सबका विकास माने देश का विकास !
अरे क्यों चिंतामग्न हैं भाई !
अब खुश भी हो जाइये
अच्छे दिन आ गये !


साधना वैद





Tuesday, January 8, 2019

गुज़ारिश




आओ ना,
डूब जायें इन लहरों में 
उड़ चलें इन आसमानों में 
विलीन हो जायें इन फूलों भरी वादियों में 
समा जायें इस खूबसूरत मंज़र में 
आओ ना, 
पल भर को ठहर जायें
संसार के इस सबसे सुन्दर घर में 
और जी लें जहान भर की खुशियाँ 
उन चंद पलों में !

साधना वैद

Thursday, January 3, 2019

मेरा कमरा - मेरा आशियाना

 


कितना अच्छा लगता है
जब अपने चहरे पर टँगी
औपचारिक मुस्कुराहटों को
सायास उतार मैं बाहर 
खूँटी पर टाँग आती हूँ
और विशुद्ध रूप से भावहीन हो
अपने इस अंतरमहल में
प्रवेश करती हूँ
जिसकी दीवारों पर
अनगिनत भावभीनी
यादों के भित्ती चित्र बड़े करीने से
चप्पे-चप्पे पर सजे हुए हैं !
इसमें आने से पहले
मध्य से तार सप्तक में
तैरने वाली अपनी
चहकती आवाज़ को
मैं छत की अलगनी पर ही
लटका आती हूँ
क्योंकि यहाँ आने पर
मेरे स्वर स्वत: ही
मंद्र सप्तक पर उतर कर
फुसफुसाहट में बदल जाते हैं !
जिस तरह नौ से पाँच
ऑफिस में काम करने वाली
कामकाजी महिला घर लौटने पर
अपने चहरे पर लगाए हुए
प्रसाधनों को व्यग्रता से
धो डालती है
उसी तरह अपने निजी कक्ष में
प्रवेश करने से पहले मैं भी
अपने चहरे से
बनावटी हर्ष और उल्लास,
हँसी और खुशी तथा
औपचारिक शिष्टाचार
के दिखावटी प्रसाधनों को
मल-मलकर
छुड़ा देना चाहती हूँ !
मेरे इस आशियाने में
किसी का भी प्रवेश
सर्वथा वर्जित है
शायद इसीलिये यहाँ मैं
स्वयं को बहुत सुरक्षित पाती हूँ !
इस कमरे के एकांत में
बिलकुल अकेले
नि:संग, नि:शब्द, शिथिल
आँखें मूँदे यहाँ की खामोशी को
बूँद-बूँद पीना मुझे
बहुत अच्छा लगता है !
मुझे अपना यह कमरा
बहुत अच्छा लगता है
जहाँ मैं खुद से
रू-ब-रू हो पाती हूँ
जहाँ मेरे चहरे पर
कोई मुखौटा नहीं होता !

चित्र - गूगल से साभार

साधना वैद

Wednesday, January 2, 2019

कब लोगे खबर मेरे राम



भोर की बेला में खिले 
सुरभित सुमनों के सुन्दर हार
शीश पर चढ़ाने के लिए 
पावन निर्मल ओस का जल
चिरंतन प्रेम का जलता हुआ 
शाश्वत दीपक 
सम्पूर्ण निष्ठा से तैयार किया हुआ 
कोमल भावों का नेवैद्य
समर्पण के लिए सभी कुछ तो
करीने से सुसज्जित है
पूजा के थाल में 
कब आओगे प्रभु इस अर्ध्य को 
स्वीकार करने 
और इस जीवन को 
कृतार्थ करने ?



साधना वैद

Sunday, December 30, 2018

आशियाना




आओ देखो
ढूँढ लिया है मैंने
हम दोनों के लिये
एक छोटा सा आशियाना
चलो इस घर में आकर रहें
सारी दुनियावी ज़हमतों से दूर
सारी दुनियावी रहमतों से दूर !
प्रेम को ओढें
प्रेम को बिछाएं
प्रेम को पियें
प्रेम को ही जियें
ना कोई हमसे मिलने आ सके
ना हम किसीसे मिलने जायें
दिन में लहरों को गिनें
रात में तारों को
दिन में पंछियों का गान सुनें
रात में झींगुरों का !
चलो न !
बहुत सुन्दर है यह मकान
हम दोनों मिल कर इसे घर बना लें
अपने ख़्वाबों की हसीं दुनिया बसा लें !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद   
    

Friday, December 28, 2018

छुअन




खुले आसमान के नीचे
प्रशांत महासागर के तट पर
शिशिर ऋतु की भीषण सर्दी में
अपने चहरे से टकराती ठंडी हवाओं की
बर्फीली छुअन को याद कर रही हूँ !
एक चहरे के अलावा बाकी सारा बदन
गर्म कपड़ों से कस कर लिपटा होता है   
चेहरे पर जैसे बर्फ सी मल देती है हवा !
नाक ठण्ड से सुर्ख हो जाती है
पलकों पर रुई के फाहे सी हिम जम जाती है
फिर भी शिशिर की यह शीतल छुअन
मुझे बड़ी सुखदाई लगती है !

फूलों के सौरभ से बोझिल वासंती बयार जब
बदन को छूकर मदालस कर जाती है
मन में ढेर सारे अरमान जगा जाती है
बागेश्री और मालकौंस की मधुर रागिनी
मन में अनुराग जगा मुझे
मदहोश सा कर जाती है तब
वासंती पवन की यह नशीली छुअन
मुझे बहुत सुहाती है !

ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी 
विकट गर्मी से व्याकुल प्राण
स्वेद बिन्दुओं से सिक्त बोझिल शरीर
कोमल बदन को भस्मसात सा करतीं
गर्म हवाएं और लू के सुलगते थपेड़े
इन हवाओं की छुअन मुझे सदा ही
आकुल कर जाती है !

वर्षा ऋतु के आगमन के साथ
माटी की सौंधी-सौंधी सुगंध से
प्राणों का एक बार पुन: खिल उठना  
बारिश की नमी सोखते ही धरा में दबे
असंख्य बीजों का अंकुरित हो जाना
हथेलियों पर झरती पहली फुहार की
नन्ही नन्ही बूंदों के सपर्श से पुलकित हो  
मन मयूर का झूम के नाच उठना
वर्षा की यह तरल छुअन मेरे लिए
जैसे संजीवनी सा जादू कर जाती है !

शरद ऋतु का शांत निरभ्र आकाश
चहुँ ओर फ़ैली उज्जवल धवल चाँदनी
प्रकृति का हर रंग हर रूप
पूर्ण रूप से मनोहारी एवं नयनाभिराम
जैसे कैनवस पर उकेरी गयी कोई नयी पेंटिंग !
शरद ऋतु की शीतल स्निग्ध चाँदनी की यह छुअन
मेरे मन में जाने कितनी कल्पनाओं,
जाने कितनी कामनाओं, जाने कितनी भावनाओं को  
स्फुरित कर जाती है !

और लो अब आ गयी हेमन्त ऋतु
साथ ले आई ढेर सारा उत्साह, सुख,
स्वास्थ्य, खुशियाँ और पर्व ही पर्व !
सुबह शाम की गुलाबी सर्दी की छुअन
कर जाती है मन प्राण आल्हादित
हो जाता है मन सुमन मुकुलित
और नव आवरण में लिपटी वसुधा
लगती है प्रफुल्लित !

हे माँ प्रकृति
तुमने हर मौसम में बड़े प्यार से
दिया है मुझे अपनी गोद में संरक्षण  
तुम्हारे वात्सल्य का यह मृदुल स्पर्श  
करता रहा है मुझमें जीवन का संचरण
मेरी प्रणाम स्वीकार करो माँ
वर दो कि कर सकूँ मैं आने वाली पीढ़ियों को
इस प्राणदायी प्रीतिकर छुअन का
अक्षुण्ण हस्तांतरण !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद