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Sunday, October 4, 2015

साहब सब्ज़ी लाये


हमारे पड़ोस में शर्मा जी रहते हैं ! सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त शर्मा जी निहायत ही सीधे सादे से सज्जन इंसान हैं ! बाल बच्चे शादी विवाह के बाद अपने-अपने घरों के हो गये ! बेटियाँ ससुराल चली गयीं ! बेटा नौकरी की वजह से परदेश चला गया और वहीं बस गया ! घर में उनके साथ रहती हैं उनकी जीवन संगिनी जिन्हें सब प्यार से शर्माइन बुलाते हैं ! 


शर्माइन अपने पतिदेव से बिलकुल अलग मिजाज़ की हैं ! आखिर घर गृहस्थी चलाने के लिये किसीको तो मोर्चा सम्हालना ही पड़ता है ! लिहाज़ा घर की बागडोर शर्माइन के हाथ में रहती है ! आलम ये कि पत्ता भी खड़कता है तो शर्माइन की इजाज़त से ! घर में क्या लाना है, कहाँ से लाना है, कब लाना है, कितना लाना है, कैसे लाना है, किसे लाना है सारे फैसले शर्माइन ही लेती हैं और उनका फरमान घर में फाइनल होता है ! साल छ: महीने में जब कभी छुट्टियों में बेटे बेटियाँ घर आते हैं तो वे भी अपनी माताजी के आदेश के अनुसार ही साँस ले सकते हैं वरना उन्हें शर्माइन के कोप का भाजन पड़ता है ! शर्मा जी के नाती पोते अगर हमारे यहाँ दस मिनिट को भी खेलने आ जायें तो पीछे-पीछे शर्माइन उन्हें अनुशासन का कोई न कोई पाठ पढ़ातीं या ‘पहले यह करो फिर खेलना’ के अंदाज़ में हिदायत देतीं बुला कर ले जातीं और बच्चे बेचारे मन मार कर चले जाते !


एक दिन शर्माइन बड़ी खुश-खुश घर आईं !

“दीदी ! हमने आज से साहब को सब्ज़ी लाने का काम सौंप दिया है ! रोज़ सुबह पार्क में टहलने तो जाते ही हैं वहाँ से लौटते समय बाज़ार से सब्ज़ी भी ले आया करेंगे ! सुबह-सुबह ताज़ी सब्ज़ी मिल जाया करेगी !” हमने सिर हिला कर उनकी बात का अनुमोदन तो किया लेकिन यह व्यवस्था लंबे समय तक चल पायेगी इसमें हमें संदेह था ! 


शर्मा जी ने अपनी सर्विस के ज़माने में कभी कोई घरेलू काम नहीं किया ! लेकिन श्रीमती जी का मानना है कि अब जब नौकरी पर नहीं जाना है तो घर के प्रति उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिये कुछ काम तो करना ही चाहिए इसलिए यह काम उन्हें सौंपा गया है ! मरता क्या न करता ! शर्मा जी बेचारे रोज़ सुबह लदे फदे थैला भर सब्ज़ी लेकर लौटते पार्क से ! लेकिन सब्ज़ी लाने बाद से उनके यहाँ आये दिन कोई न कोई नया शगूफा छिड़ने लगा ! 
  
एक दिन सुबह-सुबह शर्माइन झींकी झल्लाई सी खूब सारे बैंगन लेकर हमारे घर आयीं !
“दीदी ! साहब को तो कुछ समझ ही नहीं आता है ! बताइये हम कुल जमा दो लोग हैं और देखो तो ज़रा कितने सारे बैंगन खरीद लाये हैं ! कल तो लाये ही थे आज भी उठा लाये हैं ! हमने जब टोका इतने बैंगन क्यों ले आये तो फ़ौरन कहने लगे, "अच्छे लग रहे थे तो खरीद लिये ! मेरी लाई सब्ज़ी से दिक्कत होती है तो कल से नहीं लाया करूँ ?" भला यह भी कोई बात हुई ! सब्ज़ी तो ये ही लायेंगे !" उनके स्वर में दृढ़ निश्चय की खनक थी ! फिर थैले से बैंगन निकाल कर मुझे देते हुए बोलीं, "ये बैंगन आप बना लीजियेगा !” 
“ठीक है !" मैंने बैंगन फ्रिज की बास्केट में डालते हुए कहा !  
"लेकिन सुबह से शाम तक कॉलोनी में कम से कम सब्ज़ी के सात आठ ठेल वाले आते हैं तुम शर्मा जी को क्यों परेशान करती हो ! जो चाहिए जितना चाहिए खुद ही ले लिया करो ना !”

“नहीं, उन्हें भी तो घर का कुछ काम करना चाहिए ! सब्ज़ी तो वो ही लायेंगे !” शर्माइन का जवाब था !

“तो उन्हें बता दिया करो कि कितनी लाया करें !” हमने भी सलाह ठोक दी !


दो दिन बाद फिर सुबह-सुबह शर्माइन अवतरित हुईं !

“अब क्या हुआ ?“ हमारा सवाल था !

“आपकी सलाह के अनुसार हमने साहब को बता दिया कि हमारे यहाँ थोड़ी सब्ज़ी बनती है इसलिए बैंगन वगैरह दो से ज़्यादह नहीं लाया करें ! तो आज तो इन्होंने कमाल ही कर दिया ! सब्ज़ी के थैले में दो आलू, दो टिंडे, दो करेले, दो परवल, दो गाजर, दो टमाटर यानि कि हर सब्ज़ी दो की संख्या में है और जब हमने पूछा यह क्या है तो फिर वही रट “तो कल से सब्जी ना लाऊँ !”

किसी तरह हँसी रोक कर हमने कहा, “कोई बात नहीं मिक्स्ड वेजीटेबिल बना लो !”

“और बना कर सारी की सारी महरी को दे दूँ क्योंकि साहब तो उसे चखेंगे भी नहीं !” शर्माइन का चिढ़ा हुआ जवाब था !

“तो अब तो बख्श दो उन्हें !” हमने फिर धीरे से अपनी सलाह सरका दी !

“अजी नहीं ! सब्ज़ी तो वो ही लायेंगे ! हम भी पीछे हटने वालों में से नहीं हैं ! कभी कुछ सीखेंगे कि नहीं ?”

शर्मा जी की सब्ज़ी खरीदने की क्लास रोज़ इसी तरह चलती रही और रोज़ कोई न कोई मज़ेदार किस्सा सामने आता रहा !


दीवाली आने को थी ! सभी घरों में त्यौहार से पहले के काम छिड़े हुए थे ! साफ़ सफाई भी चल रही थी ! मौसम बदल रहा था ! गरम कपड़े बॉक्स से निकालने थे ! लिहाफ गद्दों को धूप लगानी थी ! शर्मा जी के यहाँ राज मज़दूरों का काम भी फैला हुआ था ! ऐसे में एक दिन शर्मा जी बाज़ार से ताज़ी-ताज़ी छोटी जड़ों वाली ढेर सारी थैला भर मैथी ले आये ! शर्माइन का मूड बहुत खराब ! अब इसे साफ़ करने के लिये कौन जान मारेगा ! मौसम की पहली मँहगी सौगात ! ना तो देते बन रही थी ना ही फेंकते ! इतनी महीन मैथी साफ़ करने का टाइम भी नहीं था उनके पास ! दो तीन दिन तक ऐसी ही फ्रिज में पड़ी रही ! एक दिन कुछ जोश चढ़ा तो मुरझाई मैथी से बमुश्किल सौ सवा सौ ग्राम ही साफ़ कर पाईं ! अगले दिन घर में जो बेलदारनी काम कर रही थी उसे मैथी साफ़ करने के काम में लगा दिया गया ! सारा दिन धीरे-धीरे कछुए की रफ़्तार से बेलदारनी ने जो मैथी साफ़ करके थाली में दी उसका वज़न मुश्किल से सौ ग्राम से अधिक नहीं रहा होगा ! और सूरत ऐसी कि उसे देख कर खाने की इच्छा ही मर जाए ! अंतत: मौसम की पहली मैथी कूड़ेदान के हवाले कर दी गयी ! 


शर्माइन का मलाल देखने लायक था ! मैथी बड़ी मँहगी पड़ी और थाली में परोसी भी नहीं जा सकी ! शर्माइन का चेहरा उतरा हुआ था लेकिन उनके साहब के चहरे पर पूरी बत्तीस इंच की मुस्कान फ़ैली हुई थी ! उन्हें एक फ़ायदा जो हो गया था कि सब्ज़ी लाने की आफत से उनका पीछा स्थायी रूप से छूट गया था ! कई बार सोचती हूँ यह शर्मा जी की सोची समझी साज़िश थी या सचमुच ही उनके भोले भाले अनाड़ी व्यक्तित्व की एक बानगी !



साधना वैद    





Thursday, October 1, 2015

कब आयेंगे राम



(१) 
दाता तेरे दान का, कोई ओर न छोर !
फिर भी डूबा लोभ में, पापी मन का चोर ! 

(२)
मालिक इतना दीजिये, जितनी है दरकार ! 
संचय के अपराध से, लीजे मुझे उबार ! 

(३)
अर्चन पूजन वंदना, किये नहीं स्वीकार ! 
मिली न अनुकम्पा कभी, व्यर्थ हुई मनुहार ! 

(४)
ना माणिक ना संपदा, देने को उपहार ! 
भाव कुसुम अर्पित करूँ, कर लो प्रभु स्वीकार ! 

(५)
रैन दिवस जपती रही, जिह्वा उनका नाम ! 
नैन बिछे हैं पंथ पर, बिना किये विश्राम ! 

(६)
इन्द्रिय सभी सचेत हैं, आहट पर हैं कान ! 
अंतर में मूरत बसी, उर में प्रभु का ध्यान ! 

(७)
बैठी काग़ज़ नाव में, करने सागर पार ! 
आ जाओ प्रभु तारने, थामो कर पतवार ! 

(८)
बाती बन जलती रही, डोर आस की थाम !
कौन जतन जानूँ सखी, कब आयेंगे राम ! 


साधना वैद 




Thursday, September 24, 2015

शुकराना



तुम क्या गये
भावनाओं की रेशमी नमी
जीवन की कड़ी धूप में
भाप बन कर उड़ गयी !    
स्नेह के खाद पानी के अभाव में
कल्पना के कुसुमों ने
खिलना बंद कर दिया !
पलकों के बराज में निरुद्ध झील
सहसा ही सूख कर
रेतीले मैदान में तब्दील हो गयी !
प्रेम आल्हादित हृदय के
उत्कंठा से छलछलाते गीत
कंठ में ही घुट कर रह गये !
हवाएं खामोश हो गयीं,
पेड़ पौधे गुमसुम से
निस्पंद हो गये,
खुशबुएँ सहम कर कहीं दुबक गयीं,
आसमान के थाल को खाली कर
रात ने सारे चमकते चाँद सितारे
अपनी गठरी में समेट कर
कहीं छिपा दिये !
जीवन में छाए इस अँधेरे में
भटकते हुए महसूस करती हूँ कि  
अब कोई उत्साह नहीं, विश्वास नहीं
उम्मीद नहीं, इंतज़ार नहीं
आहट नहीं, दस्तक नहीं
आस नहीं, आवाज़ नहीं,
यहाँ तक कि
नीरव रात के सन्नाटों में कहीं
सूखे पत्तों की सरसराहट भी नहीं !
अपने निर्जन, निसंग, नीरव एकांत में
बस एक अकेली मैं हूँ और
मेरे साथ है मेरा आइना
जिसमें मैं गिनती रहती हूँ
अपने चहरे पर बढ़ती हुई
हर रोज़ नई झुर्रियों को !
उम्र के इस मुकाम पर आकर
शायद एक यही काम
बाकी रह गया है
मेरे करने के लिये !
और इसके लिये मुझे तुम्हारा
आभार मानना भी तो ज़रूरी है !
तो मेरा यह शुकराना
तुम्हें क़ुबूल तो है ना ?

साधना वैद 
  
चित्र  - गूगल से साभार

Monday, September 21, 2015

तलाश जारी है


ढूँढ रही हूँ इन दिनों
अपना खोया हुआ अस्तित्व
और छू कर देखना चाहती हूँ
अपना आधा अधूरा कृतित्व
जो दोनों ही इस तरह
लापता हो गये हैं कि
तमाम कोशिशों के बाद भी
कहीं मिल नहीं रहे हैं,
और उनकी तलाश में हलकान
मेरी संवेदनाएं इस तरह
संज्ञाशून्य हो गयी हैं कि
भावनाओं के कुसुम
लाख प्रयत्नों के बाद भी
किसी शाख पर अब
खिल नहीं रहे हैं !  
आस-पास हवाओं में बिखरी
तमाम आवाज़ों में
मेरा नाम भी खो गया है
और घर के तमाम पुराने
टूटे फूटे जर्जर सामान के बीच
मेरा कृतित्व भी कहीं
घुटनों में पेट दिए
गहरी नींद में सो गया है !
कल फिर से कोशिश करूँगी
शायद रसोईघर में साग सब्जी
काटती छीलती छौंकती बघारती
आटा गूँधती रोटियाँ बनाती या फिर
स्कूल में छुट्टी के वक्त
एक हाथ से बच्चों का हाथ थामे
और दूसरे हाथ में बच्चों का
भारी बैग उठाये जल्दी जल्दी
गेट के बाहर निकलने को आतुर
स्त्रियों की भीड़ में
मुझे मेरा चेहरा दिख जाए,
और बच्चों की किसी पुरानी कॉपी के
खाली पन्नों पर या
घर के हिसाब की डायरी के
पिछले मुड़े तुड़े पन्ने पर मुझे मेरा
कृतित्व कहीं मिल जाए !
रात बहुत हो गयी है
आप भी दुआ करिये कि
मेरी यह तलाश कल
ज़रूर खत्म हो जाए
और मेरे आकुल व्याकुल
हृदय को थोड़ा सा चैन तो
ज़रूर मिल जाए !  

साधना वैद

   

Sunday, September 13, 2015

मोहभंग

Image result for Painting of a burning candle in hands of a woman

क्या होगा कागज़ पर तरह-तरह की
तस्वीरें उकेर कर ?
रेत पर खींची रेखाओं की तरह
एक दिन वे भी मिट ही जाती हैं
ज़रा कुछ देर से सही पर
मिट जाना ही उनकी भी नियति है !
क्या होगा कालीदास की तरह
मेघों को अपना सन्देश देकर ?
सारा सावन सूखा ही गया और
वे अपने कोश से सम्वेदना के
चार छींटे भी न बरसा सके !
फिर उन पर निर्भरता कैसी ?
उनके पास इतना वक्त ही कहाँ कि
फ़िज़ूल की कवायद के लिये वे
अपना समय बर्बाद करें !
क्या होगा किसीको राह दिखाने
की गरज़ से दीपशिखा की तरह
खुद को मशाल बना कर, 
पिघला कर ?
इन रास्तों पर जब किसी को 
आना ही नहीं  
तो राहें रोशन हों या अँधेरे में गुम
क्या फर्क पड़ता है !
अब तो चाँद सितारों से 
उलझना छोड़ो
अब तो सुबह शाम हवाओं की 
चिरौरी करना छोड़ो
अब तो उड़ते परिंदों से 
रश्क करना छोडो
अब तो फूलों से पत्तों से 
बातें करना छोड़ो
अब तो नदिया के बहते पानी को
आँचल में बाँधना छोड़ो  
अब तो जागी आँखों 
झूठे सपने देखना छोड़ो
इस विशाल जन अरण्य में जब
अनेकों मर्मभेदी चीत्कारें
अनसुनी रह जाती हैं तो
तुम्हारे रुदन के मूक स्वरों को
कौन सुनेगा !

साधना वैद