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Monday, March 30, 2026

कह मुकरी - 2

 




दिन भर मुझको काम बताता

सारे घर में नाच नचाता

लेकिन मन का है वो सच्चा

को सखी साजन ? ना सखी बच्चा !

ले आता मँहगे उपहार

चूड़ी, कंगन, झुमके, हार

चाहे खुश होकर दूँ दाद

को सखी साजन ? ना री दमाद !

१०

रात को जब खिड़की से आये

देख उसे दिल घबरा जाए

मन चाहे कर दूँ मैं शोर

को सखी साजन ? ना सखी चोर !

११

जैसे ही वो घर में आये

मेरी साँस गले घुट जाए

रौब दाब है उसका जबरा

को सखी साजन ? ना सखी ससुरा !

१२

जो कह दूँ वो कभी न सुनता

जो बतलाऊँ उलटा करता

करता है अपनी मनमर्ज़ी

को सखी साजन ? ना सखी दर्ज़ी !

१३

दबे पाँव घर में आ जाए

किचिन खोल सब माल उड़ाये

मक्खन, ब्रेड, जैम, अंगूर

                 को सखी साजन ? ना लंगूर !

१४

जब आकर खिड़की से झाँके

पहरों बैठा मुझको ताके

लगे मुझे हर दुःख तब मंदा

को सखी साजन ? ना सखी चंदा !

१५

मुझे देख कर सीटी मारे

ज़ोर ज़ोर से नाम पुकारे

और सुनाये मीठे बैना

को सखी साजन ? ना सखी मैना !

चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 


Wednesday, March 25, 2026

गुफ्तगू – लघुकथा

 







महीनों से एक टूटे फूटे कनस्तर में पड़े पत्थर के थोड़े से कोयलों को बड़ी हैरानी हो रही थी ! आज मालकिन ने उन्हें सालों बाद बाहर निकाला है ! सूरज की रोशनी आज ज्यादह चमकदार लग रही थी ! हवा भी तो कितनी खुशनुमां लग रही थी ! वरना इतने दिनों से सीलन भरे डिब्बे में बंद पड़े उनका तो दम ही घुटा जा रहा था ! आज शांता बाई पुरानी-धुरानी अँगीठी को भी बड़े जतन से मरम्मत करके साफ़ सुथरी मिट्टी से पोत रही थी ! पास में एक थैली में कुछ उपले भी रखे थे ! आखिर कोयलों से रहा नहीं गया तो पूछ ही लिया उपलों से ! 

“आखिर बात क्या है उपले भाई ? इतने लम्बे समय से हम तो अपने कनस्तर में बंद पड़े सो रहे थे तो दुनिया की कुछ खबर ही नहीं है हमको ! आज मालकिन को हमारी याद कैसे आ गयी ?”

उपले कुछ गुमसुम से लग रहे थे !

“अरे, तो क्या तुम्हें युद्ध की कोई खबर नहीं है कोयला भाई ? यह जो अमेरिका और इरान में युद्ध छिड़ गया है उसके कारण खाना पकाने वाली गैस की कमी हो गई है ! इसीलिये अब मालकिन को हमारी याद आई है ! यह हमारी खातिर तवज्जो इसीलिये हो रही है कि अब घर वालों की भूख मिटाने के लिए हमें अपना बलिदान देना होगा !”

“अरे, इतनी भी चिंता क्यों कर रहे हो उपले भाई ! मैं हूँ ना चिर युवा ! मेरे होते तुम पर कोई आँच नहीं आएगी ! तुम्हारी साज सजावट तो सिर्फ इसलिए है कि घर में ब्याह शादी हो तो सारे बारातियों को सज धज के तैयार रहना चाहिए ! न जाने किसकी पुकार लग जाए ! तुम चिंता न करो ! मेरे होते तुम्हारी शहादत की ज़रुरत नहीं पड़ेगी इसका भरोसा है मुझे !”

तसल्ली देती यह आवाज़ थी इन्डक्शन चूल्हे की ! 


साधना वैद   

Thursday, March 19, 2026

हासिल

 



आज ओम प्रकाश जी के घर में उत्सव का माहौल है ! वर्षों से चले आ रहे ज़मीनी विवाद के मुकदमे का फैसला आखिरकार आज उनके हक़ में आ ही गया ! उनका छोटा भाई सूरज प्रकाश, जो गाँव के प्राइमरी स्कूल में टीचर है और आर्थिक रूप से भी कमज़ोर है, मुकदमा हार गया ! इस मुकदमे को जीतने के लिए कुछ कम करतब तो ओमप्रकाश जी ने भी नहीं किये थे ! कितनी तो तिकड़में लगाईं, कितनी चालें चलीं, अधिकारियों की जेबें भरने के लिए पैसा भी कम नहीं बहाया ! तो जीत तो उनके पाले में आनी ही थी ! सूरज प्रकाश की कहाँ औकात थी उनसे मोर्चा लेने की ! प्राइमरी स्कूल का अदना सा शिक्षक, बच्चों को नैतिक शिक्षा और सदाचरण का पाठ ही पढ़ाता रह गया और मुकदमे की मार से और गरीब होता चला गया ! नैतिक शिक्षा की चादर ओढ़ कर आज की दुनिया में कहीं मुकदमे जीते जाते हैं ?

रात भर ओमप्रकाश जी के घर में शराब और शबाब के दौर चलते रहे ! बड़े-बड़े नेता, विधायक, अधिकारी सभी आमंत्रित थे ! सूरज प्रकाश के घर में आज अंधकार छाया था ! रात को चूल्हा भी न जला था ! बच्चों को मन मसोस कर सुबह के बचे खाने से कुछ निवाले खिला दिए घरवाली ने और दोनों पति पत्नी दो घूँट पानी पीकर सोने का उपक्रम करते रहे ! बड़े भाई के घर के जश्न की आवाजें मन पर घन की सी टंकार करती रहीं !

सुबह हो गयी थी ! ओमप्रकाश जी के घर से जश्न की आवाजें आना बंद हो चुकी थीं लेकिन आगंतुकों की आवाजाही बढ़ गयी थी ! तभी सूरज प्रकाश का बड़ा बेटा घबराया हुआ आया !

“पापा, ताऊजी को बड़े जोर का हार्ट अटैक आया है ! गाँव के सारे डॉक्टर्स आये हैं ! शहर के बड़े अस्पताल ले जाने की बात हो रही है ! आप चलिए ना !”

उद्विग्न सूरज प्रकाश चप्पल भी नहीं पहन पाए कि गगन भेदी विलाप के स्वर वातावरण में गूँज उठे ! सालों की जद्दोजहद के बाद मिली जीत को ओम प्रकाश जी चौबीस घंटे भी मना नहीं सके ! मुकदमा जीतने के बाद आखिर हासिल क्या हुआ उन्हें सब यही सोच रहे थे !


चित्र - गूगल से साभार 



साधना वैद
 


Tuesday, March 17, 2026

वह लड़का है - लघुकथा

 



राधिका बहुत खुश थी ! उसके परंपरावादी परिवार ने बड़ी कशमकश और तनातनी के बाद अंतत: बड़े भैया माधव के अंतरजातीय विवाह के लिए अनुमति दे ही दी ! उनके रूढ़िवादी ब्राहमण परिवार में यह एक ऐतिहासिक फैसला था कि माधव का विवाह उसके साथ पढ़ने वाली रागिनी के साथ होने जा रहा था ! यद्यपि उसके बाबा दादी और घर के अन्य वरिष्ठ सदस्य अभी भी इस निर्णय के खिलाफ थे ! ऐसा दुस्साहस अभी तक उनके खानदान में किसी ने नहीं किया था लेकिन इकलौते बेटे की जिद के आगे सबको अपने हथियार डालने ही पड़े ! राधिका खुश थी इसलिए कि अब उसका रास्ता भी साफ़ हो गया है ! जब माधव भैया का विवाह वैश्य समुदाय की कन्या के साथ हो सकता है तो उसका विवाह उसके कायस्थ दोस्त के साथ क्यों नहीं हो सकता ! विश्वास बहुत्त ही स्मार्ट, हैंडसम और प्रतिभाशाली नौजवान है और उसके साथ ही एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करता है ! उसके परिवार में सभी उच्च शिक्षित और प्रगतिशील सोच रखने वाले उदारमना लोग हैं ! मन ही मन उसने अपने सुन्दर भविष्य के सपने बुनने भी शुरू कर दिए थे ! रात को ही उसने विश्वास को पत्र में लिख दिया था कि माधव भैया की शादी के बाद वह अपने माता-पिता से अपने बारे में बात करेगी ! यह पत्र आज वह ऑफिस में विश्वास को देने वाली थी ! उसे माधव भैया और अपनी नई नवेली भाभी से भी समर्थन की पूरी आशा थी ! अधरों पर मीठी सी मुस्कान लिए उसने यही बात बताने के लिए विश्वास को वीडियो कॉल मिलाया !
उसी समय आँधी की तरह उसकी मम्मी ने कमरे में प्रवेश किया और उसके हाथ से फोन छीन कर दूर फेंक दिया ! उनके हाथ में राधिका का लिखा हुआ पत्र था !
“क्या है यह सब राधिका ?” माँ की आँखों से खून बरस रहा था !
“तुम्हारी हिम्मत भी कैसे हुई यह सब सोचने की और करने की ?”
“क्या हो गया मम्मी ? माधव भैया अपनी पसंद की लड़की से शादी कर सकते हैं तो मैं अपनी पसंद के लड़के से क्यों नहीं ?” राधिका सहम गयी थी !
“माधव से बराबरी करोगी तुम ? अरे वह लड़का है ! लड़कों के सौ गुनाह भी माफ़ हो जाते हैं लेकिन लड़की का एक गुनाह पूरे कुल को ले डूबता है ! जानती हो तुम
?




साधना वैद
 


Thursday, March 12, 2026

दोहा ग़ज़ल

 




बच्चे शिक्षक का नहीं, करते अब सम्मान
मौक़ा एक न छोड़ते, करते नित अपमान !

कोचिंग कक्षा की बड़ी, मची हुई है धूम
लेकिन लालच ने किया, इसको भी बदनाम !

दुगुनी तिगुनी फीस भर, माथा जाये घूम
कहते विद्या दान से, बड़ा न कोई दान !

साक्षरता के नाम पर, कैसी पोलम पोल
सच्चे झूठे आँकड़े
भरने से बस काम !

नैतिकता कर्तव्य को, ढीठ पी गए घोल !
प्रतिशत बढ़ना चाहिए, साक्षरता के नाम !

कक्षा नौ में छात्र सब, दिए गए हैं ठेल
ऐसी शिक्षा से भला, किसका होगा नाम !

अध्यापक और छात्र में, हो न परस्पर भीत  
शिष्य करें गुरुदेव का, मन से आदर मान !

करना होगा पितृ सम, शिक्षक को व्यवहार
बच्चे भी दर्शन करें शिक्षक में भगवान् !

 

साधना वैद

 


Wednesday, March 4, 2026

होली है

 




बुरा न मानें 

न चिढ़ें, न चिढ़ाएँ

रंग लगाएं

प्रेम और प्यार के 

दें शुभकामनाएं ।


प्यार का पर्व

है रंगों की बहार

मीठी गुंजार

है पानी की फुहार

है होली का त्योहार



चित्र - गूगल से साभार 


                साधना वैद                

Friday, February 20, 2026

सेवा

 



आप घर से बाहर कहीं भी जाइए, वो चाहे किसी भी स्तर का होटल हो, अस्पताल हो, स्कूल कॉलेज हो या कार्यालय हो आपकी सुविधा के लिए आपको हर स्थान पर सहायकों का एक दल मिलेगा जिसे उस संस्था के आयोजक सेवा दल का नाम देते हैं ! सरकारी नौकरी करने वाले लोग भी सेवक कहलाते हैं ! इसका तो नाम ही लोक सेवा आयोग है ! राजनीति में आने वाले लोग भी स्वयं को जनता का सेवक कहते हैं लेकिन उनका तो उद्देश्य ही जनता को ठगना है और सारे छल छद्म करके उनसे वोट हासिल करना है ! मेरी दृष्टि में हर वह कार्य जिसके लिए आपको वेतन मिलता है वह आपकी जीविका का साधन है सेवा नहीं ! इन सभी स्थानों पर परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से आप स्वयं ही इन सेवाओं का भुगतान करते हैं ! कभी किराए के रूप में, कभी टिप के रूप में, कभी फीस के रूप में या कभी रिश्वत के रूप में जिसे आज की प्रचलित भाषा में सुविधा शुल्क कहा जाता है ! सेवा कभी खरीदी या बेची नहीं जा सकती ! सेवा एक अमूर्त भावना है जिसके प्रतिदान में कोई भी अपेक्षा या प्रत्याशा नहीं होती ! यह सिर्फ अनन्य प्रेम, करुणा, दया या श्रद्धा से जुड़ी भावना है जिसके पीछे न कोई स्वार्थ होता है न ही लालच ! सेवा के पीछे परोपकार की भावना जुड़ी होती है जहाँ आप निर्मल मन से केवल सामने वाले के कष्ट को कम करने के प्रयास में तन मन धन से जुट जाते हैं और हर हाल में उसे सुख पहुँचाना चाहते हैं यह जानते हुए भी कि आपको इसके प्रतिदान में कुछ मिलने वाला नहीं है ! सेवा एक विशुद्ध सात्विक कर्म है जो सेवा पाने वाले और सेवा करने वाले दोनों को ही अनिर्वचनीय आनंद से भर देता है और दोनों को ही इससे परम सुख की प्राप्ति होती है !

इस निष्काम सेवा के भी तीन रूप होते हैं ! एक सेवा वह है जिसके तहत हम किसी साधू महात्मा या किसी बुज़ुर्ग को सम्मान देने के लिए उनके सारे काम करते हैं, उनके पैर दबाते हैं, उनके भोजन पानी की व्यवस्था करते हैं और उनके बाकी सारे कार्य भी करते हैं ताकि उनकी सहायता हो जाए और हमें उनका आशीर्वाद मिल जाए !  
दूसरी सेवा के तहत आता है मंदिरों या गुरुद्वारों में जाकर सेवा कार्य करना जैसे इन देवस्थानों की साफ़ सफाई
, जूते चप्पलों का रख रखाव या वहाँ की रसोई में भोजन बनाने या परसने खिलाने में मदद करना ! बर्तनों की साफ़ सफाई इत्यादि !
और तीसरी सेवा वह होती है जो बिलकुल दीन हीन, असहाय
, लाचार अस्वस्थ रोगियों के लिए की जाती है जिन्हें मदद न मिले तो उनका जीवन संकट में आ जाए !  
मेरे विचार से हर मनुष्य जिसमें मानवता शेष है अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार कुछ न कुछ सेवा तो अवश्य ही करता है !

साधना वैद


Saturday, February 14, 2026

नई विधा - जो दोनों ओर से पढ़ी जा सके

 




झीना था प्रतिरूप तुम्हाराछीना था हर चैन हमारा

अच्छा था मोहक था खेलसच्चा था रोचक था मेल

करते रहे तुम्हें हम दूरकहते रहे तुम्हें हम हूर

छलना था कितना आसानकहना था बस दो फरमान  

 

तुमको हमने चाहा यह सुख अपना था

तुमको पा हम लेंगे यह एक सपना था !

सपने लेकिन होते हैं केवल सपने

हमको पल-पल तिल-तिल करके तपना था !

 

जागी जगती, जागे पक्षी, जलचर जागे

जागी धरती, तारे, चंदा, अम्बर जागे

जागो तुम अब जाग गया सूरज देखो

जागी प्रकृति सकल सृष्टि अंतर जागे !

 

साधना वैद

 


Thursday, February 12, 2026

यह भी कविता है

 




उगता सूर्य
क्षितिज की लालिमा
भोर का गान
 

फूलों के हार
अगर की खुशबू
देवों का मान

 

उड़ते पंछी
उमड़ती नदियाँ
ढूँढें सुमीत

 

खिलते फूल
सुरभित पवन
गाते सुगीत  

 

शिशु की हँसी
ममता छलकाती
माँ की मुस्कान

  

लिखे कविता
प्रकृति कलम से
निराली शान

 

भाती सभी को
अद्भुत ये कविता
हे गिरिधारी

छेड़ दो तान
बजाओ न मुरली
कृष्ण मुरारी

 

साधना वैद


 


Wednesday, February 4, 2026

कोशिश कम रही

 






वक्त के उजले सफों पर गर्द सी कुछ जम रही
लाख चाहा भूलना पुरज़ोर, कोशिश कम रही !
हमकदम, न हमनफस, न हमसफर है साथ में
राहे मंज़िल पर अभी से चाल क्यूँ है थम रही !



चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद

Wednesday, January 28, 2026

वसंत-पंचमी लघुकथा

 


वसंत-पंचमी का त्योहार आने वाला है ! शोभा अनमनी सी बैठी हुई है ! अब तो हर त्योहार जैसे लकीर पीटने की तरह हो गया है ! न कोई उत्साह, न कोई चहल-पहल, न कोई साज-सज्जा, न कोई रौनक ! सब अपने-अपने फोन और लैप टॉप में व्यस्त रहते हैं ! दस आवाजें लगाओ तो बड़ी मुश्किल से मोबाइल में नज़रें गढ़ाए खाने की मेज़ पर आकर बैठ जाते हैं और बिन देखे प्लेट में जो परोस दिया जाता है खाकर उठ जाते हैं ! शोभा की आँखें भर आईं !

वह जब छोटी थी तो हर त्योहार कितने उल्लास के साथ मनाया जाता था ! दो तीन दिन पहले से ही घर में हलचल शुरू हो जाती थी ! घर में हर सदस्य के कपड़े पीले रंग में रँगे जाते थे ! मम्मी, चाची, भाभी की साड़ियाँ, हम बहनों के फ्रॉक या दुपट्टे ! बाबूजी
, चाचाजी, भैया के कुरते और रूमाल ! वसंत के दिन मम्मी केसर डाल कर चावल की फीरनी बनाती थीं ! दिन में भी खूब मेवा डाल कर पोंगल वाले पीले मीठे चावल और मटर पनीर का पुलाव बनता था ! पीले पतंगी कागज़ से घर का पूजाघर सजाया जाता था और हम सब बच्चे अपनी सारी कॉपी किताबें माँ सरस्वती के सामने सुबह से ही रख देते थे ताकि उन पर विद्या की देवी की कृपा हो जाए और उनसे पढ़ कर हम सब बच्चों को भी माँ शारदे का आशीर्वाद मिल जाए ! सबसे अधिक खुशी इस बात की होती थी कि उस दिन पढ़ाई से फुर्सत मिल जाती थी लेकिन फिर भी सरस्वती माँ के आशीर्वाद की गारंटी पक्की होती थी !

शोभा के पति अरुण से शोभा का मुरझाया चेहरा देखा नहीं गया ! उन्होंने शोभा से फीरनी बनाने के लिए कहा और अपना स्कूटर उठा कर बाज़ार चले गए ! लौट कर आए तो उनके पास मिट्टी के बहुत ही कलात्मक सुन्दर शकोरों से भरा हुआ थैला था ! उन्होंने जल्दी से उन्हें बाल्टी में डाल कर पानी से धोया और शोभा से फीरनी उन शकोरों में परसने के लिए कहा ! शोभा शकोरों में फीरनी डालती जा रही थी और अरुण उन पर कटे हुए पिश्ते बुरकते जा रहे थे ! शोभा का मन तरंगित हो उठा ! उसने जल्दी-जल्दी मीठे चावल बनाए और पूजा की सारी तैयारी कर बच्चों को आवाज़ लगाई !

डाइनिंग टेबिल पर मिट्टी के शकोरों में परोसी हुई फीरनी बहुत आकर्षक लग रही थी ! बच्चों की आँखें चमक उठीं, “वाओ मम्मी ! ये क्या है ! यह तो बहुत बढ़िया लग रही है ! आपने पहले तो ऐसे कभी नहीं बनाई !”
शोभा झूम उठी ! आज उसके मन में भी वर्षों के अंतराल के बाद वसंत महक उठा था !

साधना वैद


Friday, January 23, 2026

हे माता सरस्वती

 


ज्ञान की देवी
हे माँ वीणा वादिनी
साध लो सुर  
बहा दो ज्ञान गंगा
कर दो मन चंगा  !


मिटे अंधेरा
हो जाए आलोकित
संसार सारा
विनष्ट हो अज्ञान  
दंभ औ अभिमान !

दिन विशेष
आया वसंतोत्सव
करते पूजा
जलाते हैं दीपक
उतारते आरती !

हे माँ शारदे
रखो वरद हस्त
मस्तक पर
शिक्षा दो संस्कार की
उच्च सदाचार की !



हम बालक
तुम जग जननी
करो कल्याण
हे माता सरस्वती  
करें तुम्हें प्रणाम !
 



चित्र - गूगल से साभार 



साधना वैद 


 


  

Sunday, January 18, 2026

ज़िद

 



कभी सोचती हूँ
कहाँ गलती की थी
जो तुम्हारा साथ चाहा
मैं काँच तुम पत्थर
मैं कमज़ोर तुम कठोर
मैं नाज़ुक तुम मजबूत !
यह सत्य तो तुम भी
जानते ही थे और था
मेरा भी जाँचा, परखा,
सोचा
, समझा, सराहा !
तभी तो यह कसम उठाई थी
कभी नहीं टकराएंगे आपस में,
सदा एक दूरी बना कर रखेंगे
कभी पास नहीं आएंगे और
दुनिया को यह चमत्कार भी
करके ज़रूर दिखाएंगे कि
शीशे और पत्थर का प्यार
बिना टूट-फूट के भी
कामयाब हो सकता है
जो मन में हो हौसला और
कुछ कर गुज़रने की लगन तो
पत्थर पर भी गुलाब
खिल सकता है !

लेकिन जाने फिर क्या हुआ ?
सारे संकल्प धरे रह गए
और पता नहीं कैसे हम
रोज़ आपस में टकराने लगे
छोटे से आघात से मैं रोज़
रेशा-रेशा चटकने लगी और
तुम चोट पर चोट लगाने लगे
मैं रोज़ टुकड़े-टुकड़े टूटने लगी
और तुम बेरहम हो मुझे
टूटता देख हँसने खिलखिलाने लगे !  
मैं हर रोज़ घायल हो
किरच-किरच बिखरने लगी
और तुम मुझे लहुलुहान देख
पता नहीं क्यों जश्न मनाने लगे !  
जानती हूँ यह दुष्परिणाम है
मेरी मूर्खता भरी जिद का
मेरे थोथे आत्मविश्वास का
मेरी खोखली खुशफहमी का
कि मुझमें हुनर है
धाराओं का रुख मोड़ देने का
प्रवाह के विरुद्ध तैरने का
असंभव को संभव कर देने का !
मानती हूँ मैं हार गयी !
लेकिन हार कर भी इतना तो
ज़रूर जान गयी कि
पत्थर कभी फूल से 
मुलायम नहीं होते  
इस धरती पर कभी
चमत्कार नहीं होते !
 

 

साधना वैद 
 
 




Friday, January 16, 2026

सैनिक

 



भारत माता की कसम, खाते वीर जवान 
सीमा की रक्षार्थ हित, देंगे अपनी जान ! 


ब्याह रचाया मौत से, रक्त लगाया भाल 
सेना बाराती बनी, सीमाएं ससुराल ! 


मान बढ़ा कर देश का, लौटा वीर जवान
सोया है ताबूत में, करके जाँ कुर्बान !


जान गँवाई वीर ने, जमा शत्रु पर धाक
मातम छाया देश में, हुआ कलेजा चाक !


सीने में हैं गोलियाँ, क्षत विक्षत है देह
जान लुटा कर देश पे, आया अपने गेह !


बाँध कफ़न सिर पर चले, सैनिक वीर जवान 
मातृभूमि के वास्ते, करने को बलिदान !


उंतिस वर्णी फूल औ' सात रंग के हार
भारत माँ के हृदय पर, शोभित यह गल हार ! 


बाइस भाषा में लिखें, 'भारत मेरी शान'
कोटिक कंठों से करें, माता का गुणगान !

जय हिंद


साधना वैद

Thursday, January 15, 2026

जीवन की पतंग

 




निर्वाण द्वार,

जीवन की पतंग

प्रवेशातुर 


स्वागतोत्सुक 

थामने को पतंग 

प्रभु राम जी 


साधना वैद


चित्र - गूगल से साभार 

Thursday, January 8, 2026

सबक - लघुकथा

 



सरला के घर में आज किटी पार्टी थी! सुबह से सरला घर की साफ़ सफाई, व्यवस्था और साज-सज्जा में व्यस्त थी! किटी की 20 महिला मित्रों के बैठने की व्यवस्था, जल पान का प्रबंध और बीच में खेले जाने खेलों के विजेताओं को इनाम में दिए जाने वाले उपहारों को गिफ्ट पैक करना, सभी कुछ उसे देखना था! रविवार होने की वजह से आज सभी घर में थे लेकिन सरला की सहायता के लिए कोई भी तत्पर नहीं था! पति राजीव अपने लैप टॉप के साथ व्यस्त थे, बेटी सुकन्या अपनी सहेली के यहाँ उसका जन्मदिन मनाने चली गई थी और बेटा सुदीप वीडियो गेम खेलने में लगा हुआ था! सरला ने जब बेटे से सहायता करने को कहा तो उसने कह दिया, “आपकी किटी पार्टी है मैं कैसे करूँगा यह सब? आप देख लो न मम्मा! मुझे थोड़े ही आता है कुछ!” सुदीप अपना फोन उठा कर अपने कमरे में चला गया! 

पतिदेव बिलकुल निर्लिप्त अपने लैपटॉप में रील्स देखने में इतने तल्लीन थे जैसे घर में होने वाले आयोजन का उन्हें कोई अनुमान ही न हो! सरला को बहुत गुस्सा आ रहा था! उसने अपने अकेले के दम पर ही अपनी किटी पार्टी का बहुत अच्छी तरह से इंतज़ाम किया और उसकी सभी सहेलियाँ बेहद खुश होकर गईं!

अगले सप्ताह बेटे सुदीप का जन्मदिन था! वह सुबह से बहुत खुश था! शाम को उसने अपने दस बारह दोस्तों को बुला रखा था! लेकिन आज सुबह से किचिन में कोई हलचल दिखाई नहीं दे रही थी! सुदीप जानता था हमेशा की तरह मम्मी बहुत अच्छी तरह से शाम की पार्टी का सारा इंतजाम सम्हाल लेंगी! लेकिन लंच के बाद जब सरला साड़ी बदल कर अपना शॉपिंग बैग उठा बाहर जाने लगी तो सुदीप और सुकन्या दोनों ही घबरा गए! अभी तक शाम की पार्टी की तैयारी की शुरुआत भी नहीं हुई थी! न केक आया था, न घर में ही कोई पार्टी स्नेक्स सरला ने बना कर या मँगवा कर रखे थे, न कमरे में ही कोई सजावट हुई थी! सुदीप नर्वस होकर सरला के सामने जा खड़ा हुआ
, “मम्मी आप कहाँ जा रही हो? शाम को मेरे दोस्त आएँगे ना मेरा बर्थडे सेलीब्रेट करने! आप कब तक आओगी?”


“अच्छा!” सरला हैरानी से बोली, “तुम्हारा बर्थडे है ना बेटा! मैं कैसे जानूँगी आजकल के बच्चे कैसे पार्टी सेलीब्रेट करते हैं! तुम खुद ही देख लो न बेटा अपने दोस्तों को कैसे एन्टरटेन करना है तुम्हें! मुझे बहुत ज़रूरी काम है ! आने में मुझे देर हो जाएगी!” और सरला रिक्शे में बैठ कर नज़रों से दूर हो चुकी थी !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद


Saturday, January 3, 2026

संकल्प नए साल का

 



जला चुकी हूँ
कितने ही बर्तन
स्वादिष्ट खाने
दाल, चावल, सब्जी
चाय, दूध, घी
खीर, खिचड़ी, शीरा
मेरी भूल से
चमकते बर्तन
बने ठीकरा
तवा, कढाई, पैन
नया कुकर,
डेगची औ’ भगौने
भिगौते नैन
देख अपनी शक्ल
और हम भी
बिसूरते रहते
होते लज्जित
देख कर अपनी
ऐसी करनी !
लेकिन करें तो क्या
आदत बुरी
छूटे तो कैसे छूटे
भूल जाते हैं
गैस पर चढ़ा के
दाल या सब्जी
और खुल जाता है
फोन या टी वी
याद जब आती है
जल जाता है
खाना तब तक तो
सुर्ख कुकर
घूरता है हमको
लाल पीला हो !
हम डर जाते हैं
पछताते हैं
शर्मिन्दा हो जाते हैं
खुद पर ही
इसीलिये किया है
पूरी निष्ठा से
इस नए वर्ष में
यह संकल्प
खाना बन जाएगा
तभी आयेंगे
रसोई से बाहर
नहीं छोड़ेंगे
जलती गैस पर
कुछ भी चढ़ा कर !



साधना वैद