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Saturday, October 11, 2014

चलनी में चाँद






करवा चौथ की सभी बहनों को हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई ! 

भारतीय महिलाएं अपने सारे तीज त्यौहार पारंपरिक तरीके से ही मनाना पसंद करती हैं इसमें कोई दो राय नहीं हैं ! फिर बात अगर सुहाग के व्रत की हो तो उनकी भक्ति भावना, निष्ठा और समर्पण की बानगी ही कुछ और होती है ! परम्पराओं और नियमों के पालन में कोई कमी न रह जाए, हर अनुष्ठान हर विधि विधान पूरी सजगता सतर्कता के साथ संपन्न किया जाए इसका वे विशेष ध्यान रखती हैं ! आखिर अपने प्रियतम की दीर्घायु, सुख व सान्निध्य की कामना जो जुड़ी रहती है इस व्रत के साथ ! इन त्यौहारों का आकर्षण और लोकप्रियता बढ़ाने में फिल्मों और टी वी ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है इससे इनकार नहीं किया जा सकता ! यह इसी बात से सिद्ध होता है कि धार्मिक मान्यताओं को परे सरका कर इन त्यौहारों को मनाने वालों की संख्या हर साल बढ़ती ही जा रही है !

कल करवा चौथ का त्यौहार है ! उत्तर भारत में यह त्यौहार बड़े जोश खरोश के साथ मनाया जाता है ! सुहागन स्त्रियाँ अपने पति की लंबी आयु व मंगलकामना के लिये सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जल निराहार व्रत रखती है और संध्याकाल में सारे विधि विधान के साथ पूजा अर्चना कर चन्द्रमा के निकलने की आतुरता से प्रतीक्षा करती हैं ! जब आसमान में चाँद निकल आता है तब चाँद को अर्घ्य दे अपने पति के हाथ से पानी पीकर अपना व्रत खोलती है ! पति के लिये इस तरह का अनन्य प्रेम, सद्भावना और भावनात्मक लगाव सभीको प्रभावित करता है ! मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है आप सबसे यह बात साझा करते हुए कि हमारे शहर आगरा में गत वर्ष कई मुस्लिम बहनों ने भी इस व्रत को रखा ! उनका कहना था कि अपने पति की मंगलकामना के लिये तो वे भी यह व्रत रख सकती हैं ! इसमें धर्म को कहीं से आड़े नहीं आना चाहिये !

बात विषय से कुछ हट गयी है ! दरअसल इस पोस्ट को लिखने का मेरा आशय केवल इतना जानना था कि फिल्मों और टी वी को देख कर चलनी में चाँद देखने की यह जो नई परम्परा चल पड़ी है उसका औचित्य क्या है ? करवा चौथ की कहानी के अनुसार सात भाइयों की इकलौती लाड़ली बहन को चलनी में जो चाँद दिखाया गया था वह तो नकली था ! और चलनी के आर पार उस नकली चाँद की पूजा करने के बाद उसे नुक्सान भी उठाना पड़ा था ! गगन का चाँद तो स्पष्ट गोल दिखाई दे ही जाता है फिर चलनी की आवश्यकता क्यों पड़ती है ? कहानी कहती है कि व्रत के कारण भूख प्यास से आकुल व्याकुल बहन की हालत भाइयों से जब देखी ना गयी तो उन्होंने पेड़ पर चढ़ कर मशाल जला कर चलनी के पीछे से नकली चाँद बना कर बहिन को दिखा दिया और उसे कह दिया कि चाँद को अर्घ्य देकर वह अपना व्रत खोल ले ! पेड़ के पत्तों के पीछे चलनी के अंदर गोलाई में मशाल का प्रकाश देख बहन को विश्वास हो गया कि चाँद सच में निकल आया है और उसने उस नकली चाँद को अर्घ्य देकर अपना व्रत खोल लिया ! इस तरह इस कहानी के अनुसार चलनी के माध्यम से जो देखा गया था वह तो नकली चाँद था फिर स्त्रियों का अपनी असली पूजा में चलनी के पीछे से चाँद देखने का क्या औचित्य है ? क्या हम गलत परम्परा को खाद पानी नहीं डाल रहे हैं या फिर हम इस परम्परा को सिर्फ इसलिए मानने मनाने लगे हैं क्योंकि फिल्मों में और धारावाहिकों में बड़े ही भव्य तरीके से इस परम्परा की स्थापित किया जाने लगा है जहाँ सजधज कर और चित्ताकर्षक अदाओं के साथ नायिका आसमान के चाँद के बाद नायक का चेहरा चलनी में देखती है और नायक अत्यंत रूमानी तरीके से पानी पिला कर नायिका का व्रत खुलवाता है ! मुझे याद है अपने मायके ससुराल में किसीको भी मैंने चलनी के माध्यम से चन्द्र देव के दर्शन करते हुए नहीं देखा ! न ही बाज़ार में इस तरह से सजी हुई चलनियाँ मिला करती थीं ! बाज़ारवाद की परम्पराएँ तो केवल हानि लाभ के सिद्धांतों से परिचालित होती हैं लेकिन धार्मिक विश्वास और आस्थाएं जिन रीति रिवाजों से पालित पोषित होते हैं क्या उनका तर्क की कसौटी पर खरा उतरना आवश्यक नहीं ? अधिकाँश महिलायें अब चलनी के माध्यम से चाँद क्यों देखने लगी हैं मैं इसका उत्तर जानना चाहती हूँ ! आशा है मेरी शंका का समाधान कर मेरा ज्ञानवर्धन आप में से कोई न कोई अवश्य करेगा !

सभी बहनों को करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई !



साधना वैद



Sunday, August 14, 2011

तुम्हारी याद में माँ








यह सावन भी बीत गया माँ ,

ना आम, ना अमलतास,

ना गुलमोहर, ना नीम,

ना बरगद, ना पीपल

किसी पेड़ की डालियों पे

झूले नहीं पड़े !

ना चौमासा और बिरहा

की तान सुनाई दी

ना कजरी, मल्हार के सुरीले बोलों ने

कानों में रस घोला !

ना मोहल्ले पड़ोस की

लड़कियों के शोर ने

झूला झूलते हुए

आसमान गुँजाया ,

ना राखी बाँधने के बाद

नेग शगुन को लेकर

झूठ-मूठ की रूठा रूठी और

मान मनौव्वल ही हुई !

जबसे तुम गयी हो माँ

ना किसीने जीवन के विविध रंगों

से मेरी लहरिये वाली चुनरी रंगी ,

ना उसमें हर्ष और उल्लास का

सुनहरी, रुपहली गोटा लगाया !

ना मेरी हथेलियों पर मेंहदी से

संस्कार और सीख के सुन्दर बूटे काढ़े ,

ना किसीने मेंहदी रची मेरी

लाल लाल हथेलियों को

अपने होंठों से लगा

बार-बार प्यार से चूमा !

ना किसी मनिहारिन ने

कोमलता से मेरी हथेलियों को दबा

मेरी कलाइयों पर

रंगबिरंगी चूड़ियाँ चढ़ाईं ,

ना किसीने ढेरों दुआएं देकर

आशीष की चमकीली लाल हरी

चार चार चूड़ियाँ यूँ ही

बिन मोल मेरे हाथों में पहनाईं !

अब तो ना अंदरसे और पूए

मन को भाते हैं ,

ना सिंवई और घेवर में

कोई स्वाद आता है

अब तो बस जैसे

त्यौहार मनाने की रीत को ही

जैसे तैसे निभाया जाता है !

सब कुछ कितना बदल गया है ना माँ

कितना नकली, कितना सतही ,

कितना बनावटी, कितना दिखावटी ,

जैसे सब कुछ यंत्रवत

खुद ब खुद होता चला जाता है ,

पर जहाँ मन इस सबसे बहुत दूर

असम्पृक्त, अलग, छिटका हुआ पड़ा हो

वहाँ भला किसका मन रम पाता है !



साधना वैद

चित्र गूगल से साभार