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Friday, July 4, 2014

सावनी ताँका



बरस गयी
सावन की फुहार
अलस्सुबह,
भिगो गयी बदन
   सुलगा गयी मन ! 




झाँक रहा है
बादल की ओट से
नन्हा सूरज,
बाहर कैसे आऊँ 
कहीं भीग न जाऊँ !



भाग रहे थे
श्वेत श्याम बादल
आ जाये हाथ 
धरा माँ का आँचल
   ना मिला तो रो पड़े ! 



सुहावनी है
सावन की बयार
लाती है साथ 
मधुरिम पलों की
स्मृतियाँ बारम्बार !




याद आता है
बारिश में भीगना
चलते जाना
नर्म गीली दूब पे
पाँव थकने तक !


साधना वैद 

Saturday, June 28, 2014

रंग - ( तांका )


बनी जोगन
धार केसरी बाना
तजा संसार   
मीरा विरक्त हुई
हुए रंग असार !

अस्त होने को
सुनहरे से लाल
हुआ सूरज
रक्तिम मुख लिये  
छिपा नीलांचल में !

सावन आया
धानी चूनर ओढ़
धरा मुस्काई
पीले गोटे के फूल
पल्लू में टाँक लाई !

सजा व्योम में 
 लाल, नारंगी, नीला
पीला सुंदर
न्यारा इन्द्रधनुष
    जगती सारी खुश !  



साधना वैद









Sunday, August 14, 2011

तुम्हारी याद में माँ








यह सावन भी बीत गया माँ ,

ना आम, ना अमलतास,

ना गुलमोहर, ना नीम,

ना बरगद, ना पीपल

किसी पेड़ की डालियों पे

झूले नहीं पड़े !

ना चौमासा और बिरहा

की तान सुनाई दी

ना कजरी, मल्हार के सुरीले बोलों ने

कानों में रस घोला !

ना मोहल्ले पड़ोस की

लड़कियों के शोर ने

झूला झूलते हुए

आसमान गुँजाया ,

ना राखी बाँधने के बाद

नेग शगुन को लेकर

झूठ-मूठ की रूठा रूठी और

मान मनौव्वल ही हुई !

जबसे तुम गयी हो माँ

ना किसीने जीवन के विविध रंगों

से मेरी लहरिये वाली चुनरी रंगी ,

ना उसमें हर्ष और उल्लास का

सुनहरी, रुपहली गोटा लगाया !

ना मेरी हथेलियों पर मेंहदी से

संस्कार और सीख के सुन्दर बूटे काढ़े ,

ना किसीने मेंहदी रची मेरी

लाल लाल हथेलियों को

अपने होंठों से लगा

बार-बार प्यार से चूमा !

ना किसी मनिहारिन ने

कोमलता से मेरी हथेलियों को दबा

मेरी कलाइयों पर

रंगबिरंगी चूड़ियाँ चढ़ाईं ,

ना किसीने ढेरों दुआएं देकर

आशीष की चमकीली लाल हरी

चार चार चूड़ियाँ यूँ ही

बिन मोल मेरे हाथों में पहनाईं !

अब तो ना अंदरसे और पूए

मन को भाते हैं ,

ना सिंवई और घेवर में

कोई स्वाद आता है

अब तो बस जैसे

त्यौहार मनाने की रीत को ही

जैसे तैसे निभाया जाता है !

सब कुछ कितना बदल गया है ना माँ

कितना नकली, कितना सतही ,

कितना बनावटी, कितना दिखावटी ,

जैसे सब कुछ यंत्रवत

खुद ब खुद होता चला जाता है ,

पर जहाँ मन इस सबसे बहुत दूर

असम्पृक्त, अलग, छिटका हुआ पड़ा हो

वहाँ भला किसका मन रम पाता है !



साधना वैद

चित्र गूगल से साभार