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Thursday, June 18, 2020

एक बाँझ सी प्रतीक्षा


सदियों से प्रतीक्षा में रत
द्वार पर टिकी हुई
उसकी नज़रें
जम सी गयी हैं !
नहीं जानती उन्हें
किसका इंतज़ार है
और क्यों है
बस एक बेचैनी है
जो बर्दाश्त के बाहर है !
एक अकथनीय पीड़ा है
जो किसीके साथ
बाँटी नहीं जा सकती !
रोम रोम में बसी
एक बाँझ विवशता है
जिसका ना कोई निदान है
ना ही कोई समाधान !
बस एक वह है
एक अंतहीन इंतज़ार है
एक अलंघ्य दूरी है
जिसके इस पार वह है
लेकिन उस पार
कोई है या नहीं
वह तो
यह भी नहीं जानती !
वर्षों से इसी तरह
व्यर्थ, निष्फल, निष्प्रयोजन
प्रतीक्षा करते करते
वह स्वयं एक प्रतीक्षा
बन गयी है
एक ऐसी प्रतीक्षा
जिसका कोई प्रतिफल नहीं है !

साधना वैद !

Friday, June 12, 2020

अब तो जागो



कब तक तुम
अपने अस्तित्व को
पिता या भाई
पति या पुत्र
के साँचे में ढालने के लिये
काटती छाँटती
और तराशती रहोगी ?
तुम मोम की गुड़िया तो नहीं !

कब तक तुम
तुम्हारे अपने लिये
औरों के द्वारा लिये गए
फैसलों में
अपने मन की अनुगूँज को
सुनने की नाकाम कोशिश
करती रहोगी ?
तुम गूंगी तो नहीं !

कब तक तुम
औरों की आँखों में
अपने अधूरे सपनों की
परछाइयों को
साकार होता देखने की
असफल और व्यर्थ सी
कोशिश करती रहोगी ?
नींदों पर तुम्हारा भी हक है !

कब तक तुम
औरों के जीवन की
कड़वाहट को कम
करने के लिये
स्वयम् को पानी में घोल
शरबत की तरह
प्रस्तुत करती रहोगी ?
क्या तुम्हारे मन की
सारी कड़वाहट धुल चुकी है ?
तुम कोई शिव तो नहीं !

कब तक तुम
औरों के लिये
अपना खुद का वजूद मिटा
स्वयं को उत्सर्जित करती रहोगी ?

तुम बेड़ियों में जकड़ी 
कोई परतंत्र बंदिनी तो नहीं !

क्यों ऐसा है कि
तुम्हारी कोई आवाज़ नहीं?
तुम्हारी कोई राय नहीं ?
तुम्हारा कोई निर्णय नहीं ?
तुम्हारा कोई सम्मान नहीं ?
तुम्हारा कोई अधिकार नहीं ?
तुम्हारा कोई हमदर्द नहीं ?
तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं ?

अब तो जागो
तुम कोई बेजान गुडिया नहीं
जीती जागती हाड़ माँस की
ईश्वर की बनायी हुई
तुम भी एक रचना हो
इस जीवन को जीने का
तुम्हें भी पूरा हक है !
उसे ढोने की जगह
सच्चे अर्थों में जियो !

अब तो जागो 
तुम भी स्वतंत्र हो 
औरों की ही तरह खुद को 
तलाशने के लिये 
 सँवारने के लिये 
निखारने के लिये
स्थापित करने के लिये !

अब तो जागो
नयी सुबह तुम्हें अपने
आगोश में समेटने के लिये
बाँहे फैलाए खड़ी है !
दैहिक आँखों के साथ-साथ
अपने मन की आँखें भी खोलो !
तुम्हें दिखाई देगा कि
जीवन कितना सुन्दर है !


साधना वैद

Wednesday, June 10, 2020

मत करना आह्वान कृष्ण का



माना कि रण भूमि में उतरने के बाद
युद्ध करने के अलावा
कोई भी विकल्प शेष नहीं रहता !
किन्तु जीवन संग्राम में
किसी भी महासमर के लिये
अब किसी भी कृष्ण का
आह्वान मत करना तुम सखी !
किसी भी कृष्ण की प्रतीक्षा
मत करना !
इस युग में उनका आना
अब संभव भी तो नहीं !
और उस युग में भी
विध्वंससंहार और विनाश की
वीभत्स विभीषिका के अलावा
कौन सा कुछ विराट,
कौन सा कुछ दिव्य,
और कौन सा कुछ
गर्व करने योग्य
दे पाये थे वो ?
जीत कर भी तो
सर्वहारा ही रहे पांडव !
अपनी विजय का कौन सा
जश्न मना पाये थे वो ?
पांडवों जैसी विजय तो
अभीष्ट नहीं है न तुम्हारा !
इसीलिये किसी भी युग में
ऐसी विजय के लिये
तुम कृष्ण का आह्वान
मत करना सखी !
रण भूमि में विजय पताका
भले ही तुम्हारी फहर जाए
किन्तु विध्वंस की ऐसी विनाश लीला
अब देख नहीं सकोगी तुम,
संसार के किसी भी कोने में
अपना क्षोभ एवं ग्लानि विदीर्ण मुख
छिपा भी नहीं पाओगी तुम
और ना ही अब
हिमालय की गोद में
शरण लेने के लिये
तुममें शक्ति शेष बची है !



साधना वैद

Saturday, June 6, 2020

काग़ज़, कलम, दवात





फोन, मोबाइल, कम्प्यूूटर, लैप टॉप, के ज़माने में ई मेल लिखने की जगह आज खरीद कर लाई हूँ मैं एक पुराने ज़माने की कलम जिसमें स्याही भर कर लिखा करते थे और बहुत ढूँढ कर लाई हूँ साथ में एक स्याही की दवात केमिल कंपनी की ! आज एक बार फिर पुराने ज़माने के दिनों को जीना चाहती हूँ ! आज फिर मैं अतीत की वीथियों में भटक रही हूँ ! अब पहले की तरह और कुछ लिखने का शगल तो बाकी नहीं रहा इसलिए आज फिर मैं तुम्हें ख़त लिखना चाहती हूँ !

पहले लिखा करते थे ख़त कलम से ! स्याही पेन में भर कर पहले से ही तैयार रखते थे ! जो खत का मजमून लंबा हो तो इस बात का ध्यान रखते थे कि कहीं स्याही बीच में ही समाप्त न हो जाए ! कभी कभी पेन लीक कर जाते थे और हाथों की उँगलियाँ स्याही से सन जाती थीं ! बड़े जतन करते कि पेन लीक ना करे ! कभी माउथ की चूड़ियों पर वैसलीन लगाते तो कभी धागा लपेटते लेकिन सौ जतन करने के बाद भी पेन लीक कर जाते परिणाम स्वरुप सीधे हाथ की तर्जनी, अंगूठा और मध्यमा सदैव स्याही से रंगे ही रहते ! कभी कभी पन्नों पर लिखते समय स्याही के बड़े बड़े गोले टपक जाते और सारे सुलेख का सत्यानाश हो जाता ! स्कूल की यूनिफार्म तो कोई ऐसी बचती ही नहीं थी जिस पर स्याही के निशान न हों ! 

दशहरे के अवसर पर सारे पेन धो धोकर खूब चमकाए जाते और घर के अस्त्र शस्त्रों के साथ कलम और स्याही की दवात की भी पूजा होती ! उस दिन प्रसन्नता इस बात की अधिक होती थी कि सारे कलम पूजा के स्थान पर रख दिए जाते थे तो पढ़ाई से फुर्सत मिल जाती थी ! इस कलम और दवात से जुड़े जाने कितने संस्मरण और किस्से अभी तक मन मस्तिष्क में बिलकुल ताज़े हैं ! स्कूल के फर्नीचर में डेस्क पर एक खाना बना हुआ होता था जिसमें स्याही की दवात आराम से फिट हो जाती थी और उसके लुढ़कने का खतरा नहीं होता था ! सखियों सहेलियों को जन्मदिन का तोहफा एक खूबसूरत सा पेन ही हुआ करता था ! और घनिष्टतम सखी को नए पेन के साथ अपना पुराना पेन भी बड़े प्यार के साथ दिया जाता था जिसकी उसने कभी दिल खोल कर तारीफ़ की होगी ! 

जब कलम हाथ में होती थी तो जज़बात का एक तूफ़ान सा हृदय में हिलोरें लेता था ! जाने कितने पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय और सैकड़ों कॉपियाँ, डायरियाँ, रजिस्टर और काग़ज़ रंग डाले थे स्याही से इस कलम के माध्यम से ! ख़त लिखते थे तो अपना दिल ही उड़ेल कर रख देते थे ख़त में ! अब कहाँ है वो बात रिश्तों में ! ना ख़त ही लिखे जाते हैं, ना कलम की ही ज़रुरत बची और ना स्याही की ही दरकार रही ! अब तो फोन पर हाय हेलो में ही रिश्ते सिमट कर रह गए हैं ! थोड़ी अधिक अंतरंगता जतानी हो तो हर भाव को दर्शाने के लिए इमोजी हैं ना तरह तरह के उन्हें ही चिपका दिया जाता है संवादों के संग या फिर वीडियो चैट कर लीजिये ! बस हो गयी इतिश्री अंतर के उद्गारों की ! 
हमें तो चिंता सी हो गयी है पोस्ट कार्ड और अंतर्देशीय की तरह अब कलम और स्याही भी विलुप्त होने के कगार पर हैं ! कुछ दिनों के बाद इन्हें भी संग्रहालयों में ही देखा जा सकेगा और बच्चों को इनके प्रयोग के बारे में किस्से सुनाये जाया करेंगे ! 


साधना वैद









Friday, June 5, 2020

महासंग्राम




भारत भूमि के विशाल समर क्षेत्र में
छिड़ गया है महासंग्राम
आमने सामने हैं दोनों सेनाएं
एक तरफ हैं सर्वशक्तिमान प्रभु
अपने सारे दिव्यास्त्र और ब्रह्मास्त्रों के साथ
कहीं कोरोना वायरस से तबाही मचाते
तो कहीं हाहाकारी अम्फान में सबको डुबाते
कभी टिड्डी दलों के माध्यम से
सारी फसलों का सर्वनाश करते
तो कभी निसर्ग तूफ़ान के सहारे
समस्त निरीह प्राणियों के जीवन में  
विप्लवकारी उथल पुथल मचाते !
ऐसा लगता है संहारकर्ता शिवजी ने
अपना तीसरा नेत्र खोल लिया है !
समर भूमि में ईश्वर की इस परम प्रबल
चतुरंगिनी सेना के सामने है
अत्यंत दीन हीन इंसानों की निहत्थी सेना
अत्यंत आतंकित और भयभीत
जिनके पास अस्त्र शस्त्र के नाम पर हैं
चंद मास्क, कुछ सेनीटाइज़र्स,
कुछ साबुन की बट्टियाँ,
कुछ खाँसी ज़ुकाम की गोलियाँ
और कूटनीतिक रणनीति के तहत
ढेर सारी नसीहतें, पाबंदियाँ और सख्तियाँ
इस महासमर में प्रभु की इतनी
प्रबल और शक्तिशाली सेना के सामने
आम इंसान की यह निर्बल असहाय सेना
कहीं नहीं ठहर सकती लेकिन इस
आम इंसान में हिम्मत और हौसला बहुत है,
इसकी जिजीविषा ज़बरदस्त है !
जो ये एक बार ठान ले तो 
हर आपदा को परे ढकेल
माउंट एवरेस्ट तक को लाँघ जाने की और
अतल अथाह सागरों को पार कर लेने की
अद्भुत क्षमता है इस आम इंसान में !
तभी ना भारत की सारी सड़कों पर
हर विपदा को चुनौती देने के लिए
यह सर्व साधारण सेनानी सीना ताने
चला जा रहा है अपने गंतव्य की ओर !
देखना है महासंग्राम के अंत में
इस समरभूमि में विजय पताका
किसकी लहरायेगी
सर्वशक्तिमान प्रभु की या
सर्वहारा इस आम इंसान की !  

साधना वैद

Tuesday, June 2, 2020

तुम किन्नर हो क्रिमिनल नहीं



दुःख मुझे भी होता है
तुम्हारा अपमान,
तुम्हारा तिरस्कार देख कर
दिल मेरा भी रोता है
सरे राह तुम्हारा अशोभनीय
एवं विचित्र आचरण देख कर !
माना कि विधाता से भूल हुई
तुम्हें बनाने में
लेकिन उस भूल को इस तरह
सरे आम उछालना ज़रूरी तो नहीं !
अपने रूप स्वरुप को और विकृत कर
इस तरह संयम और मर्यादा को त्याग
बेढंगा फूहड़ श्रृंगार कर सड़कों पर नाचना
अश्लील हरकतें करना, भीख माँगना
और लूट खसोट करना भी
कुछ ज़रूरी तो नहीं !
संसार में वह स्त्री भी अधूरी है
जो माँ नहीं बन सकती
वह पुरुष भी अधूरा है
जो पिता नहीं बन सकता  
लेकिन क्या सब इसी स्तर पर उतर आते हैं ?
तुम स्वयं अपने अधूरेपन को
जगजाहिर करते हो अपनी हरकतों से !
ना ज्ञान की कमी है तुम्हारे पास
न विवेक की, ना ही प्रतिभा की !
फिर क्यों इनका उपयोग नहीं करते ?
तुम स्वयं ना जताओ तो
कौन तुम्हारे इस दोष को जानेगा !
क्यों तुम एक डॉक्टर, इंजीनियर,
वैज्ञानिक या प्रोफ़ेसर नहीं बन सकते ?
कोई तुम्हें विवश नहीं कर सकता
इस नारकीय जीवन को भोगने के लिए
यदि तुम स्वयं न चाहो तो !
अपना स्वाभिमान जगाओ
अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनो
आत्म मंथन करो और तोड़ डालो
इन श्रंखलाओं को जो तुम्हीं ने बाँधी हैं
स्वयं को जकड़ने के लिए
इस समाज के डर से !
तुम किन्नर हो क्रिमिनल नहीं !
अपना जीवन सँवारने का हक़ है तुम्हें
तुम चाहोगे तो सम्मानपूर्वक भी जी सकोगे
वरना जो जीवन जी रहे हो
उससे शिकायत कैसी !
यह भी तो तुम्हारा ही चुनाव है !



साधना वैद

Saturday, May 30, 2020

क्यों शलभ कुछ तो बता



क्यों शलभ कुछ तो बता,
पास जाकर दीप के क्या मिल गया
क्या यही था लक्ष्य तेरे प्रेम का
फूल सा नाज़ुक बदन यूँ जल गया !

क्यों शलभ कुछ तो बता,

लाज ना आई ज़रा भी दीप को
प्रेम के प्रतिदान में क्या फल दिया
तनिक भी ना कद्र की इस प्यार की
प्रेम की अवहेलना पर बल दिया !

क्यों शलभ कुछ तो बता,

एक दम्भी दीप के अनुराग में
क्यों भला उत्सर्ग यूँ जीवन किया
क्या मिला तुझको सिला बलिदान का
दीप की लौ का कहाँ कुछ भी गया !

बंधु तुम क्यों पूछते हो क्या मिला ?

ध्येय दीपक का बड़ा निष्पाप है
जगत से तम को मिटाना है उसे
अहर्निश जलती है बाती दीप की
पंथ आलोकित बनाना है उसे !

बंधु तुम क्यों पूछते हो क्या मिला ?

थी न मुझको लालसा प्रतिदान की
और थी ना भावना बलिदान की
मैं तो केवल एक आहुति ही बना
यज्ञ में बाती के अनुष्ठान की !

बंधु तुम क्यों पूछते हो क्या मिला ?

अलौकिक आनंद है उत्सर्ग में
जो प्रिया के वास्ते मैंने किया
पंथ को निष्कंट करने के लिए
तुच्छ यह तन ही तो बस मैंने दिया !



साधना वैद