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Wednesday, August 6, 2014

निर्झर


धरा विकल 
अविरल निर्मल 
बहता  चल
 कल कल चपल  
झर झर निर्झर !

सिंचित कर
चिर शुष्क अधर
धरा तृषित  
दे कर भर भर
अमृत मधुकर  !

भर दे व्रण
धर मन में प्रण
प्लावित होगा 
प्रति पल औ क्षण
माता का कण कण !

मुस्कुरायेगी
हरी चूनर ओढ़
गायेगी धरा
थिरकेगा गगन
झूमेगी मंद हवा !


साधना वैद