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Thursday, December 17, 2009

हाय तुम्हारी यही कहानी ( भाग – 2 )

(गतांक से आगे)
सौम्या को बुलाने के लिये महिला घर के अन्दर चली गयी थी । नीरा व्यग्रता से उनके बाहर आने की प्रतीक्षा कर रही थी । तभी अन्दर से फिर वही स्वर सुनाई दिया, ” जाओ बाहर । मथुरा से आई हैं तुम्हारी ननद रानी तुमसे मिलने । यह हर वक़्त टसुए बहा-बहा कर न जाने किसका अपसगुन मनाया जाता है । हमारा तो जीना हराम कर दिया है । जरूर वहाँ भी कुछ लिखा होगा चिट्ठी पत्री में तभी ना हम लोगों की जासूसी करने चली आ रही हैं यहाँ । जरा हाथ मुँह धोकर कपड़े बदल कर जाना नहीं तो समझेंगी हम न जाने कौन सी आफतें तोड़ रहे हैं तुम पर । “
नीरा सर से पाँव तक काँप गयी । तो सौम्या भाभी को यह सब झेलना पड़ रहा है यहाँ । तो उनके वे पत्र क्या सिर्फ झूठ का पुलन्दा भर थे ? क्यों किया इतना छल सौम्या भाभी ने उनके साथ ? नीरा का मन आकुल हो उठा । अपनी सास के निर्देश का पालन कर सौम्या शायद तैयार होने में व्यस्त हो गयी थी इसीलिये अभी तक बाहर नहीं आयी थी । भावनाओं के आवेग पर काबू पाना अब मुश्किल था । दुपट्टे के पल्लू को मुँह में ठूँस वह बाहर गैलरी में जा खड़ी हुई और सड़क की रौनक में अपना मन लगाने की कोशिश करने लगी । पर मन बार-बार अतीत की वीथियों में उसे खींचे लिये जा रहा था ।
नीरा को याद आ रहे थे वे दिन जब सुनील भैया को फैलोशिप के लिये ऑक्स्फॉर्ड जाने का प्रस्ताव मिला था । खुशी के मारे घर में किसी के भी पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ते थे । सुनील भैया की असाधारण प्रतिभा और उनके सुनहरे भविष्य के नशे के खुमार में सारा परिवार चूर-चूर था । नीरा जब भी अपनी सहेलियों से मिलती अपने सुनील भैया की प्रशंसा मे गर्व से सिर ऊँचा करके कशीदे से काढ़ती रहती । छोटे भाई अनिल ने तो अभी से लिस्ट बनाना शुरू कर दिया था कि उसे इंग्लैंड से क्या-क्या मँगवाना है भैया से जिन्हें दिखा कर वह अपने दोस्तों को चमत्कृत कर देना चाहता था । लेकिन माँ की एकमात्र इच्छा थी कि विदेश जाने से पहले भैया की शादी हो जाये । अपने देश की मिट्टी से जुड़ी परम्परावादी संस्कार वाली माँ को चिंता थी कि उनके भोले भाले बेटे को कहीं कोई विदेशी बाला अपने चंगुल में ना फँसा ले और उन्हें वहीं रहने को विवश ना कर दे इसीलिये वे बेटे के पैरों में बेड़ियाँ डाल देना चाहती थीं । पत्नी का बन्धन घर के अन्य सदस्यों के बन्धन से अधिक दृढ़ होता है इसे उनका अनुभवी मन खूब जानता था ।
सुनील भैया के जाने में केवल तीन माह का समय शेष रह गया था । भैया के लिये सचमुच युद्ध स्तर पर अपरूप सुन्दरी, सदगुणी लड़की की तलाश की जा रही थी । माँ बाबूजी का विचार था कि सौम्य, सुन्दर और सदगुणी लड़की अपने आप में सबसे बड़ा दहेज लेकर आती है अत: अन्य किसी दहेज की आवश्यक्ता नहीं थी । सुन्दर सजीले सुनील भैया, उज्ज्वल सम्भावनाओं से भरपूर उनका सुनहरा भविष्य तथा दहेजरहित विवाह का प्रस्ताव विवाह योग्य कन्याओं के अभिभावकों को चुम्बकीय आकर्षण के साथ अपनी ओर खींच रहे थे और तभी ढेर सारे प्रस्तावों और तस्वीरों में से सौम्या का चुनाव किया गया था । स्वप्न सुन्दरी सी रूपवती सौम्या यथानाम तथागुण थी । सलज्ज, सुलक्षण, सम्वेदनशील, समझदार, बचपन से ही पितृसुख से वंचित रह जाने के कारण अतिरिक्त गम्भीर और अंतर्मुखी । विवाह से पूर्व जब नीरा माँ के साथ सौम्या को देखने गयी थी तो उसकी इन्हीं विशेषताओं के कारण पहली ही भेंट में उसकी भक्त हो गयी थी ।
शादी के बाद सौम्या अपनी ससुराल में आ गयी थी और नीरा तथा अनिल के साथ इतनी घुलमिल गयी थी कि सबको अचरज होता था । सुनील आश्वस्त था कि इतनी समझदार पत्नी उसकी अनुपस्थिति में घर के सभी सदस्यों का बहुत ध्यान रखेगी । माँ बाबूजी आश्वस्त थे कि सौम्या के रूप में उन्होंने सुनील के पैरों में इतनी सुदृढ़ ज़ंजीर डाल दी है कि वह काम खत्म होते ही भागा-भागा स्वदेश वापिस आयेगा । नीरा और अनिल आश्वस्त थे कि सौम्या भाभी के साथ घर का वातावरण हमेशा स्निग्ध और मधुर तो रहेगा ही हल्का भी रहेगा और सौम्या आश्वस्त थी कि सुनील के विदेश जाने बाद विछोह के तीन वर्ष नीरा और अनिल के सुखद सान्निध्य में हँसते खेलते कट जायेंगे । सारा दिन घर में हास परिहास चुहलबाजी होती रहती और धमाल मचा रहता । माँ बाबूजी परम संतुष्ट मुग्धभाव से अपने सुख संसार के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान हो बच्चों की इतना खुश देख विभोर होते रहते ।
तीन महीने का समय पलक झपकते ही निकल गया । सुनील भैया के ऑक्स्फॉर्ड जाने की घड़ी समीप आ गयी । और तभी वह काली रात आयी जो उनके सुख संसार को क्षण भर में छिन्न-भिन्न कर गयी । अतीत की वीथियों में खोयी नीरा उस अनिष्टकारी प्रसंग को याद कर सिहर गयी जब विमान दुर्घटना में सुनील भैया की मौत की मनहूस खबर उन्हें मिली थी ।