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Saturday, December 5, 2009

मिड डे मील और जाँच के आदेश

आजकल अखबारों में खराब मिड डे मील का मामला सुर्खियों से छाया हुआ है । खराब, बासी, दूषित, कंकड़युक्त और दुर्गंधपूर्ण खाने की अंतहीन शिकायतों के साथ अभिभावकों और विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाएं भी विचारणीय हैं । आज 5 दिसम्बर 2009 के दैनिक जागरण में पृष्ठ 2 पर एक छात्र का पत्र पढ़ने योग्य है । समाचार पत्र की लिंक दे रही हूँ
www.jagran.com

लेकिन पाठकों की सुविधा के लिये मैं यहाँ पर इस पत्र को उद्धृत करना चाहूँगी ।
“मैडम, पुरानी शिकायतें दिखवा लें
बीएसए मैडम. यह् पत्र लिखने वाला एक परिषदीय स्कूल का छोटा सा छात्र है । मैडम हम मिड डे मील में कैसा खाना खाते हैं, यह आपको जागरण ( अखबार )से पता चल ही गया होगा । मुझे भी पता चला है कि आपने मामले की एक रिपोर्ट तलब की है । परंतु छोटा होने पर भी मैं एक सवाल उठा रहा हूँ कि जाँच के तो अक्सर आदेश हो जाते हैं, रिपोर्ट माँग ली जाती है परंतु आखिर कार्यवाही कितने मामलों में होती है ? आपकी नेकनीयती पर हमें बिल्कुल संदेह नहीं परंतु यदि कार्यवाही करना चाहती हैं तो पूर्व में आई शिकायतों की फाइल शनिवार को ही लाल फीते से बाहर निकलवा लें । इसके बाद एक तरफ से कार्यवाही कर दें । हाँ, भोजन की और खराब क्वालिटी में कितना सुधार हुआ यह फिर देखने के लिये किसी भी दिन शहरी और देहात क्षेत्र के किसी भी स्कूल में निरीक्षण फिर कर लें । बच्चे आपके बड़े आभारी होंगे । “ उपरोक्त पत्र मिड डे मील की योजनाओं और उनके कार्यान्वयन की प्रक्रिया की त्रुटियों की ओर बरबस ही सबका ध्यान आकृष्ट करता है । क्या जाँच के आदेश देकर अधिकारी अपना पल्ला झाड़ सकते हैं ? क्या ऐसी शिकायतें पहली बार आयी हैं ? अगर पहले भी आयी हैं तो उन पर कब और क्या कार्यवाही हुई क्या जनता को, जिनमें बच्चे व उनके अभिभावक भी शामिल हैं, इस बारे में जानकारी देने की कोई ज़रूरत नहीं समझी जाती है ? आखिर कब तक ये भ्रष्ट नेता और अधिकारी आम जनता के स्वास्थ्य और उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे ? जाँच के आदेश देने का मतलब है कि दोषी व्यक्तियों को राहत दे दी जाये और उन्हें अपने कुकृत्यों पर पर्दा डालने और लीपापोती करने के लिये समय दे दिया जाये ताकि वे सारे सबूत मिटा सकें और अपनी गर्दन बचा सकें । जाँच का ऐसा ढोंग करने का औचित्य क्या है ?
इस बात पर विचार करने की बहुत आवश्यक्ता है कि बच्चों को गरम भोजन ही देने की क्या ज़रूरत है ? यदि आप लोग भूले नहीं होंगे तो दक्षिण भारत के एक स्कूल में बच्चों के लिये खाना बनाते वक्त भयंकर आग लग गयी थी जिसमें कई बच्चों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ गया था । ऐसी विरली दुर्घटनाओं को छोड़ भी दिया जाये तो गरम खाने के नाम पर जिस तरह का घटिया खाना वर्तमान में बच्चों को दिया जा रहा है क्या वह उचित है ? कंकड़ और कीड़ेयुक्त दुर्गंधपूर्ण दलिया और दूध की जगह पानी में पकाई गयी खीर देना क्या बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करना नहीं है ?
गरम भोजन के स्थान पर बच्चों को अच्छे स्तर का अधिक कैलोरीयुक्त पैक्ड खाना क्यों नहीं दिया जाता जिनमें उस पैकेट क़े खाद्य पदार्थ के बारे में सभी जानकारी उपलब्ध होती है ? ऐसे पैकेट्स के वितरण पर कोई सवाल नहीं उठेंगे और उन्हें बाँटने में भी सुविधा होगी । अच्छे स्तर के बिस्किट्स, पाउडर मिल्क के पाउच , चकली और चिक्की इत्यादि के पैकेट्स इसमें शुमार किये जा सकते हैं । इन पदार्थों की बेंच लाइफ भी अधिक होती है तो इनका भंडारण भी आसानी से किया जा सकता है और स्कूलों में रसोई बनाने के ताम झाम से भी मुक्ति मिल सकती है । यदि अच्छी कम्पनियों से सम्पर्क किया जायेगा तो वे बच्चों के लिये सब्सीडाइज़्ड दामों पर छोटे पैक़ेट्स में अपने यहाँ के उत्पाद अवश्य उपलब्ध कराने में सहयोग करेंगे और बच्चे भी प्रसन्नतापूर्वक इनका आनंद उठायेंगे । बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं और दुर्बल कंधों पर हम कितना भार डाल सकते हैं कभी यह भी सोचा है आपने ?

साधना वैद