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Friday, December 18, 2009

हाय तुम्हारी यही कहानी ( भाग – 3 )

( गतांक से आगे )
“ नीरा “ सौम्या की आवाज़ नीरा को विह्वल कर गयी । पीछे मुड़ कर देखा तो वाणी गूँगी हो गयी । यह सौम्या ही थी या उसकी परछाईं ! दुख की कालिमा से सँवलाया चेहरा, निस्तेज आँखें, दुर्बल काया । नीरा जैसे आसमान से नीचे आ गिरी । यत्न से सँवारा गया मेकअप और नयी चमचमाती साड़ी सौम्या के मुख की उदासी और दुर्बलता को छिपाने में अक्षम थे । पल भर सौम्या को एकटक देख नीरा सौम्या के गले से लिपट फफक पड़ी, “तुम्हें क्या हो गया है भाभी ! यह कैसी दशा बना रखी है अपनी ? “ सौम्या एकदम चुप थी । आँखों से अविरल मौन अश्रुधारा बह रही थी । नीरा फिर फूट पड़ी, “ तुमने तो लिखा था भाभी तुम बहुत खुश हो यहाँ । लेकिन तुम तो पहले से आधी रह गयी हो । “ सौम्या ने कस कर नीरा का मुख अपनी हथेली से दबा दिया । इस संकेत से नीरा कुछ समझ पाती इससे पहले ही सौम्या की सास का कर्कश स्वर गूँजा, “ भूखा जो मारते हैं हम उसे आधी नहीं होगी क्या ? ऐसी ही दुलारी थी तो निकाला क्यों था उसे अपने घर से ? जब से यहाँ आयी है नरक बना के रखा है घर को अभागी ने । अपनी माँ के घर में थी तो बाप को निगल गयी , पति के घर गयी तो पति को निगल गयी अब हमारा नसीब उजाड़ने आ गयी है यहाँ तो ना जाने किसकी बारी आ जाये । विमल तो पड़ा ही है दो महीनों से अस्पताल में । “ उन्होंने ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया ।
अति नाटकीय इस प्रसंग से नीरा के मस्तिष्क में छाया भ्रम का कुहासा सहसा छँट गया । उसने तीक्ष्ण दृष्टि सौम्या के मुख पर डाली । वह अपमान से थरथर काँप रही थी । नीरा को समझ में आ गया था सौम्या क्यों इतनी चुप, उदास और दुर्बल है । ऐसे माहौल में भला कोई साँस भी कैसे ले सकता है ! अब पल भर भी वहाँ रुकने की उसकी इच्छा नहीं थी लेकिन सौम्या बलपूर्वक हाथ पकड़ उसे अपने कमरे में ले गयी । दरवाज़ा अन्दर से बंद कर वह कटे वृक्ष की तरह नीरा की गोद में ढह गयी । देर तक जी भर कर रो लेने के बाद ही सौम्या कुछ बोल पाने के योग्य हो पाई, “ नीरा तुम लोगों ने क्यों मुझे इस घर में भेज दिया ? मैं वहीं तुम्हारे भैया के नाम के सहारे सारा जीवन माँ बाबूजी के चरणों में बिता देती । उसी में मेरा जीवन सार्थक हो जाता । इसी संसार में मैंने उस घर सा स्वर्ग और इस घर सा नर्क सब साथ-साथ भोग लिये हैं । वहाँ तुम सबने मुझे इतना प्यार दिया, मान-सम्मान दिया यहाँ मैं सबकी आँखों की किरकिरी हूँ । सब मुझसे कतराते हैं, घृणा करते हैं, मुझे मनहूस समझते हैं क्योंकि मेरे यहाँ आने के चन्द हफ्तों बाद ही विमल का सड़क दुर्घटना में पैर टूट गया और वह अभी तक अस्पताल में है । नीरा बोलो इसमें मेरा क्या दोष है ? क्या ये सारे दुर्योग मेरे मनोवांछित थे ? क्या इन सारे दुखद प्रसंगों का उत्तरदायित्व मेरा है ? “
नीरा स्तब्ध अवाक थी । सौम्या को सांत्वना देने के लिये उसके पास शब्द नहीं थे । कहाँ किससे भूल हो गयी ! क्या माँ बाबूजी ने जिस उदारता का परिचय दिया था वह इस परिणति के लिये ! क्या उनका यही इष्ट था ! नीरा का मन ऊहापोह में फँसा था । सौम्या चाय बनाने के लिये रसोईघर में चली गयी थी और नीरा फिर से अतीत की दुखद स्मृतियों के वन में भटक गयी थी ।
विमान दुर्घटना में सुनील भैया की आकस्मिक और असामयिक मृत्यु से उन लोगों के जीवन में घनघोर अंधकार छा गया था । माँ और बाबूजी बिल्कुल ही टूट गये थे । उनके तो जीवन का जैसे प्रयोजन ही समाप्त हो गया था । सौम्या दुख से कातर हो गयी थी । नीरा और अनिल को लगता था जैसे बगीचे में वसंत आते ही हिमपात हो गया हो । सारा परिवार अवसाद के गह्वर में आकण्ठ डूब गया था । तूफान में घिरी सौम्या की नाव बिना नाविक के हिचकोले खा रही थी । मायके में पिता भी नहीं थे । भाई सबसे छोटा था और सौम्या से छोटी दो बहनें और भी थीं जो अभी पढ़ रही थीं । बेटी के दुर्भाग्य ने माँ का सपना ही तोड़ दिया था । सौम्या को गले लगा कर वे फूट-फूट कर रो पड़ी थीं, “ जो किस्मत में लिखा है उसे कौन बदल सकता है बेटी पर अब यही तेरा घर है और ये ही तेरे माता-पिता हैं । इन्हीं को सदा अपना सहारा मानना और इनकी सेवा में ही अपना जीवन सार्थक करना । “
नीरा की माँ के मन में सहसा बिजली सी कौंध गयी । उसी रात नीरा जब आधी रात को पानी पीने के लिये उठी तो उसने सुना माँ बाबूजी से कह रही थीं, “ बहू के बारे में आपने कुछ सोचा ? अभी उसकी उम्र ही क्या है, कैसे काटेगी इतना बड़ा जीवन अकेले ? साल दो साल में नीरा भी शादी के बाद अपने घर चली जायेगी । हम लोग जीवन भर थोडे ही बैठे रहेंगे । फिर इस बेचारी का क्या होगा ? “
“ तुम ठीक कह रही हो नीरा की माँ ! “ पिताजी का गम्भीर स्वर सुनाई दिया, “ कुछ तो करना ही होगा । सोचता हूँ थोड़ा समय निकल जाने दो फिर अच्छा घरबार देख कर सौम्या का विवाह कर दिया जाये । हम समझ लेंगे ईश्वर ने हमें एक नहीं दो बेटियाँ दी हैं । उसका कन्यादान भी हम करेंगे । तुम उसका मन टटोल कर देखना । वह मान जायेगी तो हम लड़का देखना शुरू करेंगे । “ ( क्रमश: )