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Wednesday, December 16, 2009

हाय तुम्हारी यही कहानी ( कहानी )

कॉल बेल का बटन दबाते समय नीरा के हृदय में बड़ी उथल पुथल हो रही थी – हो सकता है दरवाज़ा सौम्या भाभी ही खोलें या उनके पति विश्वास हों ! अगर कहीं सौम्या भाभी ही हुईं तो कैसे उनसे मिलूँगी ! कस के लिपट जाऊँगी उनसे । पिछले छ: महीनों में जो भावनायें मन में उमड़ती रही हैं मिलते ही सारी की सारी उनके सामने उड़ेल कर रख दूँगी । नीरा अधीर हो रही थी । कितना छटपटाई है वह इन बीते दिनों में सौम्या के सान्निध्य के लिये । शंकाओं ने फिर सिर उठाया – कहीं सौम्या भाभी यहाँ नहीं हुईं तो ? अगर हुईं भी तो क्या उनके पास वक़्त होगा उसकी बकवास सुनने के लिये ? उन्होनें लिखा था विश्वास उसे पल भर भी आँखों से दूर रखना नहीं चाहते और उनके सास ससुर तो सौम्या जैसी बहू को पाकर जैसे निहाल ही हो गये हैं । घर का हर सदस्य उसकी छोटी से छोटी इच्छा पूरी करने के लिये हमेशा तत्पर रहता है ।
नीरा का मन आशंकित हो उठा _ इतने प्यार दुलार मान सम्मान के बीच कहीं सौम्या भाभी बदल तो नहीं गयी होंगी ! उनकी रुखाई उनका ठण्डा फीका व्यवहार वह कैसे झेल पायेगी । पता नहीं वे घर पर होंगी भी या नहीं ! उन्होंने लिखा था विश्वास उन्हें टूर पर भी अपने साथ ले जाते हैं । वह तो सौम्या भाभी के अलावा अन्य किसी को यहाँ ठीक से जानती भी नहीं है । नीरा उद्विग्न हो उठी । उसे पूर्व सूचना दिये बिना यहाँ इस तरह नहीं आना चाहिये था । तरह-तरह के प्रश्न मन में उठ रहे थे । धड़कते दिल से उसने बटन दबा ही दिया और अपने भावोद्रेक पर भरसक नियंत्रण कर दरवाज़ा खुलने की प्रतीक्षा करने लगी ।
अन्दर से कुण्डी खुलने की आवाज़ आई और द्वार खुलते ही एक प्रौढ़ महिला का चेहरा सामने दिखाई दिया । नीरा के चेहरे पर उचटती सी दृष्टि डाल उन्होंने रूखे स्वर में पूछा, ” कहिये! किससे मिलना है ? “
स्वर के तीखेपन से नीरा हत्प्रभ हो गयी उसे लगा अचानक उसकी आवाज़ जैसे कहीं खो सी गयी है । मस्तिष्क में सन्नाटा छा गया । प्रश्न के प्रत्युत्तर में वास्तव में उसे सोचना पड़ गया कि वह यहाँ क्यों आयी है । यत्न करने पर विचारों का सूत्र पकड़ में आया । स्वर के कम्पन पर किसी तरह नियंत्रण कर उसने धीरे से कहा ,
” नमस्ते आण्टीजी! मैं सौम्या भाभी से मिलने आई हूँ । वे घर पर हैं क्या ? “
“ सौम्या भाभी ..! कहाँ से आयी हो ? अच्छा-अच्छा तुम क्या मथुरा से आई हो ? आओ अन्दर आओ । घर पर ही हैं तुम्हारी सौम्या भाभी । बैठो बुलाती हूँ अभी । “
’तुम्हारी सौम्या भाभी ‘ इस तरह की व्यंगोक्ति का कोई औचित्य और प्रयोजन नीरा की समझ में नहीं आया । भाषा में कोई दोष नहीं था लेकिन मात्र स्वरों के उतार चढ़ाव से कैसे किसी को घायल किया जा सकता है इस कला में वे भलिभाँति निष्णात लगीं । नीरा सहसा बचैन हो उठी । उसे यहाँ नहीं आना चाहिये था लेकिन सौम्या भाभी से मिलने की उत्कण्ठा और अपने नये घर परिवार में उनको रचा बसा देखने का मोह् उसे यहाँ तक खींच लाया । प्रौढ़ महिला की तीक्ष्ण दृष्टि और वाणी की चोट से असहज हो सहमते हुए नीरा ने कमरे में प्रवेश किया । सौम्या की सास से नीरा का यह प्रथम परिचय था ।
( क्रमश: )