Followers

Friday, December 25, 2009

उलझन

अभी तक समझ नहीं पाई कि
भोर की हर उजली किरन के दर्पण में
मैं तुम्हारे ही चेहरे का
प्रतिबिम्ब क्यों ढूँढने लगती हूँ ?
हवा के हर सहलाते दुलराते
स्नेहिल स्पर्श में
मुझे तुम्हारी उँगलियों की
चिर परिचित सी छुअन
क्यों याद आ जाती है ?
सम्पूर्ण घाटी में गूँजती
दिग्दिगंत में व्याप्त
हर पुकार की
व्याकुल प्रतिध्वनि में
मुझे तुम्हारी उतावली आवाज़ के
आवेगपूर्ण आकुल स्वर
क्यों याद आ जाते हैं ?
यह जानते हुए भी कि
ऊँचाई से फर्श पर गिर कर
चूर-चूर हुआ शीशे का बुत
क्या कभी पहले सा जुड़ पाता है ?
धनुष की प्रत्यंचा से छूटा तीर
लाख चाहने पर भी लौट कर
क्या कभी विपरीत दिशा मे मुड़ पाता है ?
वर्षों पिंजरे में बंद रहने के बाद
रुग्ण पंखों वाला असहाय पंछी
दूर आसमान में अन्य पंछियों की तरह
क्या कभी वांछित ऊँचाई पर उड़ पाता है ?
मेरा यह पागल मन
ना जाने क्यूँ
उलझनों के इस भँवर जाल में
आज भी अटका हुआ है ।


साधना वैद