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Wednesday, December 9, 2009

न दिल में ज़ख्म न आँखों में ख्वाब की किरचें

न दिल में ज़ख्म न आँखों में ख्वाब की किरचें
फिर किस गुमान पे इतने दीवान लिख डाले
तमाम उम्र जब इस दर्द को जिया मैने
तब कहीं जाके ये छोटी सी ग़ज़ल लिखी है ।

साधना वैद