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Thursday, June 13, 2019

हारती संवेदना


क्या करोगे विश्व सारा जीत कर

हारती जब जा रही संवेदना ! 


शब्द सारे खोखले से हो गये ,

गीत मधुरिम मौन होकर सो गये ,

नैन सूखे ही रहे सुन कर व्यथा ,

शुष्क होती जा रही संवेदना ! 


हृदय का मरुथल सुलगता ही रहा ,

अहम् का जंगल पनपता ही रहा ,

दर्प के सागर में मृदुता खो गयी ,

तिक्त होती जा रही संवेदना ! 


आत्मगौरव की डगर पर चल पड़े ,

आत्मश्लाघा के शिखर पर जा चढ़े ,

आत्मचिन्तन से सदा बचते रहे ,

रिक्त होती जा रही संवेदना !


भाव कोमल कंठ में ही घुट गये ,

मधुर स्वर कड़वे स्वरों से लुट गये ,

है अचंभित सिहरती इंसानियत ,

क्षुब्ध होती जा रही संवेदना ! 


कौन सत् के रास्ते पर है चला ,

कौन समझे पीर दुखियों की भला ,

हैं सभी बस स्वार्थ सिद्धि में मगन ,

सुन्न होती जा रही संवेदना !





साधना वैद

17 comments :

  1. अति सुंदर लेख

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  2. हार्दिक धन्यवाद महोदय ! आभार आपका !

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (15 -06-2019) को "पितृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ" (चर्चा अंक- 3367) पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है

    ….
    अनीता सैनी

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  4. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार अनीता जी ! सप्रेम वन्दे !

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  5. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति ,सादर नमस्कार

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  6. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार कामिनी जी ! सप्रेम वन्दे !

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  7. बहुत सुन्दर

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  8. हार्दिक धन्यवाद केडिया जी ! आभार !

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  9. हार्दिक धन्यवाद सुशील जी ! आभार !

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  10. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
    १७ जून २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  11. सुप्रभात
    शानदार अभिव्यक्ति और शब्द चयन |

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  12. वाह!!साधना जी ,अद्भुत !!

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  13. जी ! आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी ! सप्रेम वन्दे !

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  14. हार्दिक धन्यवाद जीजी ! आभार आपका !

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  15. हार्दिक धन्यवाद शुभा जी ! आभार आपका !

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  16. बहुत सुन्दर !
    दानवीय महत्वाकांक्षाओं के आगे मानवीय संवेदनाओं की क्या बिसात?

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