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Friday, September 23, 2011

शायद


तुमने आज चाँद देखा था ?

तुम्हें भी उदास लगा था ना

मेरी तरह ?

पता नहीं कैसे

मेरे मन की सारी

अनकही बातें भी

वह सुन लेता है और फिर

मेरी ही तरह ज्योत्सना की

धवल चादर लपेट

खामोश हो आसमान की बाहों में

लुढ़क जाता है !

तुमने चाँदनी की नमी को

अपनी पलकों पर

महसूस किया था ?

उस शबनमी छुअन में

जो आर्द्रता थी ना

वह मेरे आँसुओं की थी

जो ना जाने कब उसने

मेरी पलकों से सोख ली

और तुम्हारे ऊपर बरसा दी !

तुमने सितारों की रोशनी को

देखा था जलते बुझते ?

वो भी तो मेरी ही

ख्वाहिशें थीं

कभी सहमतीं

कभी लरजतीं,

कभी बनती

कभी बिगड़तीं !

मुझे चाँद को देखना

अच्छा लगता है

शायद... वहीं समय के

किसी एक पल पर

ठिठक कर

हम दोनों की नज़रें

एक दूसरे से मिल जायें

और वह सब कुछ

कह जायें जो

आज तक अनकहा ही

मन में घुट कर

रह गया !

शायद.....



साधना वैद

Saturday, September 17, 2011

जश्न


पलक के निमिष मात्र से

क्षितिज में उठने वाले

प्रलयंकारी तूफान को तो

शांत होना ही था ,

तुम्हें बीहड़ जंगल में

अपनी राह जो तलाशनी थी !

गर्जन तर्जन के साथ

होने वाली घनघोर वृष्टि को भी

तर्जनी के एक इशारे पर

थमना ही था ,

तुम्हें चलने के लिये पैरों के नीचे

सूखी ज़मीन की ज़रूरत जो थी !

सागर में उठने वाली सुनामी की

उत्ताल तरंगों को तो

अनुशासित होना ही था ,

तुम्हारी नौका को तट तक

जो पहुँचना था !

ऊँचे गगन में

अपने शीर्ष को गर्व से ताने

सितारों की हीरक माला

गले में डाले उस पर्वत शिखर को भी

सविनय अपना सिर झुकाना ही था

कीर्ति सुन्दरी को उसका यह हार

तुम्हारे गले में जो पहनाना था !

राह की बाधाओं को तो

हर हाल में मिटना ही था

तुम्हें मंजिल तक जो पहुँचना था !

सांध्य बाला को भी अपने वाद्य के

सारे तारों को झंकृत करना ही था ,

उसे तुम्हारी स्तुति में

सबसे सुन्दर, सबसे मधुर,

सबसे सरस और सबसे अनूठे राग में

एक अनुपम गीत जो सुनाना है

तुम्हारी जीत के उपलक्ष्य में !

जीत का यह जश्न तुम्हें

मुबारक हो !



साधना वैद

Wednesday, September 14, 2011

मंगलकामना


















है भावना मेरी प्रगति के
पुण्य पथ पर तुम बढ़ो ,
है कामना मेरी सफलता
के शिखर पर तुम चढ़ो ,
यह गान गौरव देव गण
गायें गगन में सर्वदा ,
औ' हों सुवासित दिक् दिशायें
कीर्ति सौरभ से सदा !

शुभकामनायें !

साधना वैद

Monday, September 12, 2011

क्षणिका













माना
कि अब तक राष्ट्र हित में
तुम सदा संलग्न थे ,
माना कि औरों की व्यथा से
तुम समूचे भग्न थे ,
फिर ये बताओ देश चिंता को
ग्रहण क्यों लग गया ,
जो था तुम्हारे आसरे वो
आम जन क्यों ठग गया !

साधना वैद

Thursday, September 8, 2011

चूक कहाँ हुई है ?

कितने दुःख और चिंता का विषय है ! देश की राजधानी में दिन दहाड़े आतंकवादी अपने खतरनाक इरादों को अंजाम दे देते हैं और तरह-तरह के दावे करने वाले हमारे नेता और अपनी चाक चौबस्त रक्षा व्यवस्था की दुन्दुभी बजाने वाली हमारी पुलिस के आला अधिकारी ज़रूरत के वक्त नज़रें चुराते हुए दिखाई देते हैं ! हाई कोर्ट जैसे महत्वपूर्ण स्थान पर सुरक्षा व्यवस्था इतनी लचर कैसे थी और क्यों थी कौन इसका जवाब देगा हमें ?
दरअसल प्रशासनिक अमले और पुलिस का सारा ध्यान नेताओं के इशारे पर निर्दोष और निहत्थी जनता का दमन करने में लगा रहता है क्योंकि यहाँ उसकी कार्यवाही की सफलता का परिणाम तुरंत दिखाई दे जाता है ! लेकिन गहरे बिलों में घुसे सतर्क और चौकस आतंकवादियों को पकड़ने में उन्हें भी शायद कोई दिलचस्पी नहीं रहती क्योंकि सफलता के आसार बहुत दूर और बहुत कम दिखाई देते हैं ! आखिर उन्हें भी तो अपने सेवा कार्यकाल में सफलता के लहराते परचम को ऊँचा रखना है , चंद मैडिल अपनी वर्दी पर और जड़वाने हैं और अपने अहम् की संतुष्टि भी करनी है ! क्या यही वजह नहीं है कि भ्रष्टाचार उन्मूलन के अन्ना हजारे के देशव्यापी अभियान के बाद नेताओं की सारी ऊर्जा, शक्ति और संसाधन अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, बाबा रामदेव, प्रशान्तभूषण तथा इनके सहयोगियों को धूल चटाने की मुहिम में जुटी गयी और देश के बाकी सारे अहम कार्यों की अवहेलना की जाने लगी जिनमें आम जनता की सुरक्षा भी शामिल है और इसका दुष्परिणाम भी तुरंत ही देखने के लिये मिल गया !
सुरक्षा के नाम पर जनता का करोड़ों रुपया हर बार खर्च किया जाता है और नतीजा वही सिफर रहता है ! उदाहरण के लिये एक दृष्टान्त ही काफी है कि लगभग हर शहर में रेलवे प्लेटफार्म और बस अड्डों पर मेटल डिटेक्टर लगाए गये हैं ! सारे दिन सैकड़ों यात्री उनके बीच से गुज़रते हैं ! लगातार बीप भी बजती रहती है लेकिन कोई अधिकारी वहाँ चेक करने के लिये नहीं होता ! ऐसी ढीली व्यवस्था के चलते क्या कोई आतंकवादी शहर में प्रवेश नहीं कर सकता ? और जब मेटल डिटेक्टर लगाने का कोई अर्थ और औचित्य है ही नहीं तो किसलिए सरकार ने जनता से वसूले गये धन का इस तरह से दुरुपयोग किया ?
ऐसे दुर्दांत आतंकवादियों को बचाने के लिये, उन्हें फाँसी के फंदे से उतारने के लिये और मानवीय अधिकारों की दुहाई देकर जीवन भर उनके भरण पोषण का जिम्मा जनता के जर्जर कन्धों पर लादने के लिये हमारे नेता सदैव तैयार रहते हैं लेकिन यह नहीं सोचते कि जैसा भ्रष्टाचार हमारे सिस्टम में व्याप्त है उसके चलते इन्हें जेल के अंदर भी वे सारी सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं जिनके सहारे वे सुदूर स्थित अपने आकाओं के साथ लगातार संपर्क में बने रहते हैं और उन तक अपने देश की सारी गुप्त जानकारियाँ और गतिविधियों की सूचनाएं उपलब्ध कराते रहते हैं ! आतंकवादियों की इस तरह पैरवी करके क्या हम अपनी ही आस्तीनों में साँपों को पालने के लिये स्थान नहीं बना रहे हैं ? ज़रा सोचिये और अपने इन नेताओं के निरावृत चहरे देख कर इनकी नीयत को भी पहचानिये कि इनकी कथनी और करनी में कितना फर्क है और जो बातें ये कहते हैं उनमें कितना उनका अपना स्वार्थ निहित है और कितना जनता का ! जिस दिन जनता जागृत हो जायेगी और वह जान जायेगी कि असली देशद्रोही तो वे लोग हैं जो सारी सत्ता, शक्ति, अधिकार और सामर्थ्य रखते हुए भी जनता के हित की अनदेखी कर रहे हैं और अपना हित साधने में लगे हुए हैं उसी दिन भारत आत्मनिर्भर और स्वयम्भू हो जायेगा ! हमारे शासन तंत्र और नीति नियंताओं की सोच में कमियाँ ही कमियाँ हैं तभी तो मुट्ठी भर आतंकवादी ऐसी हरकतों को सफलता के साथ अंजाम दे लेते हैं और हमारी इतनी काबिल पुलिस, इतनी सामर्थ्यवान सेना और इतनी विशाल संसद में हर वक्त धमाल मचाये रहने वाले नेताओं की गर्वीली दम्भोक्तियाँ इन मुट्ठी भर आतंकवादियों के सामने बौनी सिद्ध हो जाती हैं ! ज़रा सोचिये चूक कहाँ हुई है !

साधना वैद

Tuesday, September 6, 2011

जाने क्यों







जाने क्यों आज भी

भागता है मन उन

परछाँइयों के पीछे

जो वर्षों पहले उँगली छुड़ा कर

मुझसे इतनी दूर जा चुकी हैं

कि अब ना उनका मुझ तक

लौटना मुमकिन है

ना ही मेरा उन तक

पहुँचना सम्भव है !

जाने क्यों तरसते हैं कान

सदियों पहले हवाओं में

विलीन हो चुकी उस आवाज़ की

प्रतिध्वनि को सुनने के लिये

जो पता नहीं कैसे भूल से

एक बार मेरे नाम को

शायद अनजाने में ही

उच्चारित कर गयी थी और

अब काल के गह्वर में

कहीं डूब कर रह गयी है !

जाने क्यों युगों पहले

अपनी हथेली पर गिरे

उस एक आँसू की नमी से

मैं अपने मन की बगिया के

मुरझाये पौधे को सींचने की

कोशश में आज भी जुटी हूँ

जो कदाचित

किसी और की पीड़ा से

द्रवित होकर मेरी हथेली पर

छलक पड़ा था और

जिसकी उष्मा ने

उस एक पल में

मुझे समूचा ही

पिघला दिया था !

जाने क्यों आज तक

समझ नहीं पाई कि

आसमान में उड़ने वाले

स्वच्छंद पंछी कभी

पिंजरे में क़ैद होकर

रहना नहीं जानते,

कि पर्वत से उतरने वाली धारा

कभी अपनी दिशा बदल

पलट कर वापिस

पर्वत पर नहीं चढ़ती,

कि शाख से टूट कर

विच्छिन्न हुआ फूल

कभी लौट कर दोबारा

शाख पर नहीं खिलता !

साधना वैद

Sunday, September 4, 2011

तस्मै श्री गुरुवै नम:

सभी पाठकों को ५ सितम्बर को आने वाले शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !


याद नहीं है आज कि बचपन में सर्वप्रथम मेरे नन्हें से हाथ में कलम थमा कर सबसे पहले किसने मुझे अक्षर ज्ञान कराया था ! शायद मम्मी होंगी या फिर बाबूजी, या फिर घर की हर छोटी बड़ी बात में दिलचस्पी रखने वाले मेरे चाचाजी या फिर अध्यापन कार्य में जुटे और मुझे बेहद प्यार करने वाले मेरे मामाजी ! आज मुझे बिलकुल भी याद नहीं है ! हाँ यह ज़रूर याद है कि पाँच वर्ष की अवस्था में मेरा विद्यारंभ संस्कार बड़ी धूमधाम से मनाया गया था और घर में बिलकुल शादी ब्याह जैसी रौनक और गहमा गहमी का वातावरण था ! हो सकता है उस दिन जो पण्डित जी विधि संपन्न कराने आये थे उन्होंने ही सबसे पहले मुझे ग से गणेश लिखना सिखाया हो ! एक बात तो तय है अक्षर ज्ञान चाहे किसीने भी कराया हो इन सभीने मेरे जीवन के आरंभिक वर्षों में मुझे जो भी सिखाया जितना भी सिखाया आज उसीकी मजबूत बुनियाद पर मेरे जीवन की इमारत हालात की झंझाओं के बीच भी अकम्पित खड़ी है ! इसलिए आज मेरे सबसे पहले प्रणाम के अधिकारी मेरे पूज्य माता पिता, मेरे निकट के कुटुम्बीजन और वे सभी गुरुजन हैं जिनके नाम मुझे याद नहीं लेकिन जिन्होंने मेरे जीवन के आरंभिक वर्षों में शब्दों से मेरा परिचय करवाने में अपना अनमोल समय लगाया होगा और मेरे नन्हे- नन्हे हाथों की टेढ़ी मेढ़ी लिखावट में अपनी मेहनत का प्रतिफल ढूँढ कर सच्चे मन से हर्षित होकर मेरी पीठ थपथपाई होगी !

बाबूजी मध्य प्रदेश की जुडीशियरी में उन दिनों मजिस्ट्रेट थे ! बहुत छोटे-छोटे ग्रामीण इलाकों में उनकी पोस्टिंग होती थी ! मुझे आज भी याद है मुख्य सड़कों से वे स्थान इतनी दूर होते थे कि समुचित परिवहन सेवायें उपलब्ध ना होने के कारण कई गाँवों में तो बैल गाड़ियों में बैठकर हमें गंतव्य तक पहुँचना होता था ! उन दिनों भारत के ग्रामीण इलाकों तक बिजली नहीं पहुची थी ! मिट्टी के तेल से जलने वाली लालटेन का प्रयोग रोशनी के लिये किया जाता था ! रोज शाम का एक महत्वपूर्ण कार्य यही था कि धूँए से अटी लालटेन की काँच की चिमनियों को चमका कर साफ़ किया जाता था, उनकी निवार की बत्ती को काट छाँट कर थोड़ी सी गोलाई देकर तराशा जाता था और टंकी में मिट्टी का तेल यथेष्ट मात्रा में डाल कर उन्हें जलाया जाता था ! और फिर तीन पायों की छोटी छोटी तिपाइयों के ऊपर उन्हें हर कमरे के कोने में रख कर कमरे का अन्धकार दूर किया जाता था ! ऐसे ही ग्रामीण इलाकों के छोटे-छोटे स्कूलों में मेरी शिक्षा आरम्भ हुई जहाँ बच्चे टाटपट्टियों पर बैठते थे और कक्षा में मात्र एक मेज़ और एक कुर्सी अध्यापक जी या अध्यापिका जी के लिये हुआ करती थी ! पहला स्कूल जिसमें मैंने सर्वप्रथम प्रवेश लिया था वह खाचरौद में था ! मुझे आज भी याद है कि मिट्टी की स्लेट और लकड़ी की तख्ती और सरकण्डे की कलम लेकर कैसे हम सब बच्चे उछलते कूदते स्कूल जाया करते थे और सारा दिन स्कूल में मिट्टी के आम, शरीफे, बैंगन और मिर्ची बनाया करते थे ! उस स्कूल की शिक्षिकाओं का नाम तो आज मुझे याद नहीं है लेकिन मुझे लिखाने पढाने में उन्होंने सर्वाधिक मेहनत की होगी इस तथ्य से मैं भलीभाँति परिचित हूँ ! मेरा दूसरा प्रणाम उस स्कूल के शिक्षक वृन्द को समर्पित है !

खाचरौद के बाद बाबूजी का स्थानांतरण एक अन्य गाँव आगर में हुआ ! यह भी एक छोटा सा गाँव था ! घर के पास ही एक दोमंजिला मकान में छोटा सा स्कूल था ! कक्षा दो से लेकर चार तक इसी स्कूल में मेरी प्राथमिक शिक्षा हुई ! इस स्कूल में भी टीचर जी की कुर्सी के पास स्टैण्ड पर एक छोटा सा ब्लैकबोर्ड रखा रहता था जिस पर कभी सफ़ेद तो कभी रंगीन चौक से लिख कर वे हमें हिन्दी की कक्षा में कवितायें और गणित की कक्षा में पहाड़े लिख कर याद कराती थीं ! अपनी याददाश्त पर मुझे आज बहुत क्षोभ हो रहा है ! अपनी क्लास टीचर का चेहरा तो मुझे धुँधला सा याद है लेकिन उनका नाम मुझे याद नहीं है ! घर के सामने एक मोहनसिंह् जी मास्टर साहेब रहते थे जो हमारे स्कूल में तो नहीं पढ़ाते थे लेकिन उनकी बेटी मोहिनी मेरे साथ उसी क्लास में पढ़ती थी तो वे खाली समय में उसके साथ मुझे भी बैठा लिया करते थे और दोनों को मनोयोग से जोड़ बाकी गुणा भाग सिखाया करते थे ! मेरा अगला प्रणाम आगर के शिक्षक वृन्द को है जिन्होंने पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ मुझे व्यावहारिक ज्ञान के भी अनमोल पाठ पढ़ाये !

आगर के बाद पदोन्नति के साथ बाबूजी का स्थानांतरण खरगोन हुआ यह तुलनात्मक रूप से कुछ बड़ा शहर था ! यहाँ शहर तक बस सेवा उपलब्ध थी ! यहाँ शहर और घर बिजली की रोशनी से जगमगाते दिखाई देते थे और पहली बार मेरा दाखिला ऐसे स्कूल में हुआ था जहाँ कक्षा में बच्चों के बैठने के लिये भी डेस्क और बेंचेज थीं ! कक्षा में बहुत बड़ा सा ब्लैकबोर्ड दीवार में ही जड़ा हुआ था ! अपने स्कूली जीवन के पहले और परम आदरणीय जिन शिक्षक का नाम मुझे याद है वे इसी स्कूल में कक्षा पाँच में मेरे क्लास टीचर थे ! और उनका नाम था अमीर खाँ साहेब ! हमें हिन्दी पढ़ाते थे और भावुक इतने थे कि एक दिन कक्षा में ‘माँ’ पर लिखी कविता का अर्थ समझाते-समझाते खुद भी रो पड़े ! उनसे जुड़ा यह वाकया मेरे मन पर अमिट छाप छोड़ गया ! उनकी हिन्दी की हैण्ड राईटिंग इतनी सुन्दर थी कि उनके मोती जैसी लिखावट के शब्द आज भी आँखों के सामने तैरते रहते हैं ! बच्चों का इतना ख्याल रखते थे कि एक बार मैं शायद गलत टाइम टेबिल लिख लेने की वजह से सेकेण्ड शिफ्ट में होने वाली परीक्षा का पर्चा देने स्कूल नहीं गयी ! पर्चा शुरू हो गया और जब उन्होंने मुझे अनुपस्थित पाया तो अमीर खाँ साहेब अपनी साइकिल उठा कर सीधे घर पर आ गये ! घर हमारा स्कूल के पास ही था ! पहले तो प्यार से डाँट लगाई लापरवाही के लिये और फिर अपने साथ साइकिल पर बैठा कर इम्तहान दिलवाने के लिये ले गये ! अगर उस दिन वे ना आते तो मैं तो फेल ही हो जाती ! यह सन् १९५८ की बात है ! किताबी ज्ञान के अलावा हमदर्दी और मानवीयता के जज्बे का पहला सबक घर के सदस्यों के अलावा मैंने अमीर खाँ साहेब से ही पहली बार सीखा ! इसी स्कूल के जिन दूसरे टीचर का नाम मुझे याद है वे थे दीक्षित सर जो हमारे स्पोर्ट्स टीचर थे और बड़े मनोयोग से हमें खो खो, बाधा रेस इत्यादि का प्रशिक्षण दिया करते थे ! यह प्रणाम उन सभी टीचर्स के लिये है जिन्होंने उम्र के इस मुकाम पर मेरे व्यक्तित्व को सँवारने में अथक प्रयास किया !

जब कक्षा सात में आये तो बाबूजी का स्थानान्तरण शाजापुर हो गया था ! यहाँ शासकीय कन्या विद्यालय में मैंने प्रवेश लिया ! श्रीमती नायक और सुधा प्रचण्ड क्रमश: हमारी कक्षा सात और कक्षा आठ की क्लास टीचर थीं ! उनके अलावा श्रीमती व्यास हमें संगीत सिखाती थीं ! सुल्ताना सिद्दीकी और श्री महेश सक्सेना हमें अंग्रेज़ी और गणित पढ़ाया करते थे ! आज उन सभी महान विभूतियों को हृदय से धन्यवाद करने की इच्छा हो रही है जिन्होंने मेरी जीवन यात्रा के हर पड़ाव पर मेरा उचित मार्गदर्शन किया और अपने ज्ञान के आलोक से मेरे रास्ते के अन्धकार को मिटाया !

१९६१ में बाबूजी का ट्रांसफर रीवा हो गया ! यहाँ हम लोग एक साल ही रहे ! सुदर्शन कुमारी गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल में मेरा एडमीशन हुआ ! पता नहीं क्यों इस जगह की यादें मेरे मानसपटल पर उतनी साफ़ नहीं हैं जितनी इससे पहले की हैं ! रीवा की जिन दो टीचर्स के नाम मुझे याद हैं वे एक हैं मिस टंडन जो हमें अर्थ शास्त्र पढ़ाती थीं और दूसरी हैं मिस राज सोंधी जो हमारी एन सी सी की कोच थीं और जिनके साथ हम पहली बार एन सी सी कैम्प अटेण्ड करने रीवा से इंदौर गये थे ! यह प्रणाम रीवा की उन सभी शिक्षिकाओं के लिये है जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मेरी इस जीवन यात्रा को आगे बढ़ाने में मेरा मार्ग प्रशस्त किया है !

रीवा के एक साल के प्रवास के बाद बाबूजी का स्थानांतरण पदोन्नति के साथ जगदलपुर हुआ ! अब वे ए डी जे हो चुके थे ! यहाँ हम चार साल रहे ! महारानी लक्ष्मीबाई गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल में कक्षा दस में मैंने १९६२ में प्रवेश लिया ! इस जगह से मेरा बहुत प्यारा सा दिली रिश्ता है ! एक भी चेहरा एक भी याद धूमिल नहीं है ! श्रीमती कहाले हमारी क्लास टीचर हुआ करती थीं ! होम साइंस टीचर मिस नमिता मुखर्जी, मिस रमा मुखर्जी, मिस निर्मला जारी, श्रीमती रायचौधरी, मिस यदु, इंग्लिश टीचर मिस अईयर, मिस कला ठाकुर, मैथ्स टीचर श्रीमती झा, श्रीमती कुसुम ठाकुर, हमारे संगीत टीचर श्रोती सर, तबले पर संगत देने वाले शालिग्राम सर तथा हमारी प्रिंसीपल मिस देवांगन सभी के चहरे आँखों के सामने बिलकुल स्पष्ट हैं ! इनके साथ बिताया हर पल अनमोल रहा है मेरे लिये और किशोर वय के बहुमूल्य वर्षों में इनके मार्गदर्शन और शिक्षाओं ने मेरे व्यक्तित्व को निखारने में अविस्मरणीय योगदान किया है ! स्कूल की अनेकों गतिविधियों डांस, ड्रामा, वाद विवाद प्रतियोगिता, संगीत प्रतियोगिता, एन सी सी के कैम्पस या पिकनिक पार्टीज़ के अनेकों अवसर पर पग पग पर इन्होंने हम लोगों की सँवारा, सम्हाला, प्रशिक्षित किया और हमारा हौसला बढ़ाया ! मुझे याद है मिस अईयर के निर्देशन में मैंने और मेरी अभिन्न सखी जया ने अंग्रेज़ी के एक छोटे से प्रहसन ‘ Mr. & Mrs. Twiddle ‘ का मंचन किया था ! और नाटक समाप्त होने के बाद हमेशा सख्त और चुप चुप रहने वाली मिस अईयर ने खुशी के मारे हम दोनों को स्कूल की सभी छात्राओं के सामने अपने गले से लगा लिया था ! उनकी ऐसी विरली भावाभिव्यक्ति सबको अचरज में डाल गयी थी ! आज भी मन अपरिमित कृतज्ञता के भाव से उन पलों को याद कर भावुक हो उठता है ! इन सभी शिक्षक वृन्द को मेरा भावभीना नमन अर्पित है !

१९६४ में हायर सेकेंडरी पास कर लेने के बाद जगदलपुर के एकमात्र गवर्मेंट डिग्री कॉलेज में बी ए में दाखिला लिया ! उस ज़माने में डिग्री कोर्स तीन साल का हुआ करता था ! कॉलेज में प्रवेश लेने के साथ ही एक नयी दुनिया में कदम रखा ! कॉलेज में सहशिक्षा की व्यवस्था थी ! यहाँ पर बेहद गुणीजनों से शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला ! हिन्दी साहित्य श्री कान्ति कुमार जैन तथा श्री जायसवाल जी पढ़ाते थे ! इकॉनोमिक्स श्री दिनेश कुमार श्रीवास्तव जी पढ़ाते थे और इंग्लिश साहित्य श्री भोलाराम जी तथा श्री दिनेश प्रसाद पाण्डेय जी पढ़ाते थे ! प्रिंसीपल साहेब श्री ताराचंद जैन थे ! ग्रेजुएशन के पहले दो साल जगदलपुर में ही गुज़रे ! कॉलेज की सभी गतिविधियों में भाग लेने का मुझे बहुत शौक था ! कॉलेज में दोनों साल मैं गर्ल्स रिप्रेजेंटेटिव रही ! दोनों साल बैडमिंटन चैम्पियन भी रही ! इसके अलावा कैरम भी मेरा प्रिय इनडोर गेम था ! कॉलेज के प्लैनिंग फोरम की भी सदस्या रही ! वार्षिक समारोह में स्टेज पर कोरस गीतों और नाटकों का मंचन भी खूब किया ! इन सभी गतिविधियों के सफल निष्पादन में कॉलेज के प्राध्यापक वर्ग के सक्रिय निर्देशन की अहम भूमिका हुआ करती थी ! मुझे याद है उन दिनों भारत पाक युद्ध के दौरान एन डी एफ के लिये धन एकत्रित करने के उद्देश्य से हम लोगों ने एक चेरिटी शो भी किया था जिसमें श्री दिनेश प्रसाद पाण्डेय द्वारा लिखित व निर्देशित एक प्ले “ देश नहीं टूटेगा “ का मंचन किया था ! हमारी सोच को एक सकारात्मक दिशा देने में और कच्ची मिट्टी से हमारे व्यक्तित्व को एक रूप और आकार देने में जगदलपुर कॉलेज के हमारे प्राध्यापक वर्ग का विशिष्ट योगदान रहा है और आज कृतकृत्य भाव से मैं उन सभीका हृदय से धन्यवाद एवं कृतज्ञता ज्ञापन करना चाहती हूँ ! उन सभीको मेरा सविनय प्रणाम समर्पित है !

बी ए फाइनल मैंने मुरेना से किया क्योंकि बाबूजी का ट्रांसफर तब मुरेना हो चुका था ! यहाँ के 'गिरवर लाल प्यारेलाल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज' में मैंने प्रवेश लिया ! उस समय यही एक कॉलेज था उस शहर में ! विवाह पूर्व मेरी एकेडेमिक शिक्षा का यह अंतिम पड़ाव था ! यहाँ पर भी कुछ अविस्मरणीय प्राध्यापक मिले जिन्होंने मेरे ज्ञानार्जन की इच्छा को मनोयोग से पूरा किया ! अंग्रेज़ी साहित्य पढाने वाले श्री डब्ल्यू एच मालागार जी तथा श्री ए के भट्टाचार्य जी के अनमोल योगदान को मैं कभी नहीं भूल सकती ! मालागार साहेब हार्डी का ‘ Far from the madding crowd ‘ पढ़ाते थे और भट्टाचार्य जी शेक्सपीयर का ‘ Othello ‘ पढ़ाते थे ! इनके अलावा श्री आर एम सक्सेना जी, हिन्दी साहित्य के श्री भट्ट साहेब तथा अर्थशास्त्र के श्री ओ पी शुक्ला जी तथा के बी लाल साहेब का भी बहुत बहुत आभार है जिनके अध्यापन ने मुझे अपनी बी ए की डिग्री प्राप्त करने में बहुत मदद की !

आज शिक्षक दिवस पर बड़े कृतज्ञ भाव से इन सभी महानुभावों को मैं अपने श्रद्धासुमन अर्पित करना चाहती हूँ ! नहीं जानती इनमें से आज कौन कहाँ है ! शायद कुछ लोग अब इस संसार में भी नहीं हैं ! ईश्वर उन्हें अपनी शरण में लें ! लेकिन जो अभी भी इस संसार में विद्यमान हैं और कहीं न कहीं विद्यादान के पुण्य कर्म में लगे हैं या अपने अनुभवों की समृद्ध सम्पदा को वितरित कर अपने घर परिवार के सदस्यों का जीवन सँवार रहे हैं मेरी हृदय से यह इच्छा है कि मेरा यह कृतज्ञता ज्ञापन उन तक ज़रूर पहुँचे ! यदि इनमें से किसीने भी मेरी यह पोस्ट आज पढ़ ली तो मेरा लिखना सफल हो जायेगा !

ओम् श्री गुरुवै नम: !

शिक्षक दिवस पर आप सभीको हार्दिक शुभकामनायें एवं अभिनन्दन !

साधना वैद