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Thursday, February 12, 2026

यह भी कविता है

 




उगता सूर्य
क्षितिज की लालिमा
भोर का गान
 

फूलों के हार
अगर की खुशबू
देवों का मान

 

उड़ते पंछी
उमड़ती नदियाँ
ढूँढें सुमीत

 

खिलते फूल
सुरभित पवन
गाते सुगीत  

 

शिशु की हँसी
ममता छलकाती
माँ की मुस्कान

  

लिखे कविता
प्रकृति कलम से
निराली शान

 

भाती सभी को
अद्भुत ये कविता
हे गिरिधारी

छेड़ दो तान
बजाओ न मुरली
कृष्ण मुरारी

 

साधना वैद


 


6 comments :

  1. सुबह की नरम धूप जैसी कविता .. समय को अर्पित फूल से भावों की माला !
    अभिनंदन और धन्यवाद !

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका ! बहुत-बहुत आभार !

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  2. कोमल अहसास जागती नरम सी कविता

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    1. हृदय से आभार अनीता जी ! बहुत-बहुत धन्यवाद आपका !

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  3. Replies
    1. हृदय से धन्यवाद एवं आभार आपका !

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